राम के बहाने रामकथा और भारतीय इतिहास का पुनर्पाठ - कुछ प्रश्न
जनतंत्र में मुकेशजी ने रामनवमी के मौके पर राम के चरित्र की अपनी तरह से व्याख्या की। और विवाद तो उठना ही था क्योंकि एक अरब बीस करोड़ लोगों के देश में एक कहावत है कि अपनी अक्ल और दूसरे की जोरू सबको प्यारी लगती है। मुझे भी अपनी अक्ल प्यारी लगती है। लिहाजा मैंने भी अपनी प्रतिक्रिया लिख डाली। उसी का थोड़ा संशोधित संस्करण यहां डाल रहा हूं। एक अरसे के बाद ब्लॉग पर कुछ पोस्ट क
रना अच्छा लग रहा है।
केवल अपने पुरखों से, समाज से सुन कर मैं उसे आंखें बंद करके मान लूं तो लानत मेरे सोचने-समझने की शक्ति पर है।धर्म मेरे लिए निजी आस्था का विषय है, नरेंद्र कोहली ने अपना रामकथा में राम के व्यक्तित्व को जो रुप दिया है, जिस तरह से विकसित किया है ... उसके आधार पर मैं राम को मर्यादा पुरूषोत्तम या महानायक मानने के तैयार हूं। इसमें राम का मानवीय रूप बहुत अच्छे से विकसित होता है। इस किताब को मैंने पचासों बार पढ़ा है.. जब भी पढ़ता हूं राम से प्रेरित होता हूं .. जब भी किसी मुसीबत में होता हूं रामकथा का यही पाठ/यही विश्लेषण याद आता है, प्रेरित करता है मुसीबतों का सामना करने के लिए।
लेकिन न तो वाल्मीकि के राम को और न ही तुलसी के राम को मैं मानवीय, महानायक या मर्यादा पुरूषोत्तम मानने को तैयार हूं। दोनों ही किताबें इतिहास कम, साहित्य ज्यादा हैं।
सोनमृग की तलाश कर रहे राम की सहायता के लिए जाने को लक्ष्मण विवश हुए) ... वो भी दृश्य याद करें जब समुद्र पार करने का रास्ता तलाश पाने में विफल होने पर राम अपने रौद्र रूप में आ कर अपने बाण से समुद्र को सुखा डालने और वरूण का नामो-निशान मिटाने का ऐलान करते हैं और फिर पत्थर पर रामनाम लिखने से वो समुद्र में नहीं डूबता है ...। वाल्मीकि और तुलसी के राम तो हर कदम पर चमत्कार करते दिखते हैं और हम कहते हैं कि राम का रूप तो मानवीय था। वाह!!!
राम तो राजकुमार थे, वाल्मीकि/तुलसी कहते हैं कि राम राजकुमार थे, अयोध्या के राजा दशरथ के बेटे थे और राजा लोग महलों में रहते थे। मतलब ये कि राम का जन्म तो महल में ही हुआ होगा (लव-कुश की तरह जंगल में नहीं)। तो फिर वो महल कहां गए ? अगर राम तीन-चार-पांच हजार साल पहले थे, तो उतने पुराने अवशेष आज की अयोध्या में तो होने ही चाहिए (आखिर आज की ही अयोध्या को हमने राम की भी अयोध्या माना है)। लेकिन आज तक ऐसा कोई भी पुरातात्विक अवशेष नहीं मिला। अयोध्या में जो भी मिला है वो पांच सौ से पंद्रह सौ साल पुराना है। मतलब ईसा के जन्म के बाद और हमारे धर्मग्रंथों की मानें तो राम तो ईसा से कई सौ या हजार साल पहले थे। मतलब क्या आज की अयोध्या सही है या हमारे धर्मग्रंथ किसी और अयोध्या की बात करते हैं। पहले इसे स्थापित कर लीजिए, ऐतिहासिक और पुरातात्विक सबूतों के आधार पर। फिर ये तय करिए कि बाबरी मस्जिद का वो विवादित ढ़ांचा जिसे हम राम का जन्मस्थान मानते हैं, वो सही है या गलत। 


