<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572</id><updated>2011-12-04T16:09:39.683+05:30</updated><category term='ब्लोग के नखरे'/><category term='कनुप्रिया'/><category term='सीताराम येचुरी'/><category term='वित्त मंत्री'/><category term='राम के बहाने'/><category term='अपना पागलपन'/><category term='आत्मालाप'/><category term='पिता'/><category term='अपनी कविता'/><category term='जाति'/><category term='मीडिया विमर्श'/><category term='मेरी पसंदीदा कविताएं'/><category term='मुंबई पर हमला'/><category term='ब्लॉग'/><category term='आईए चुनाव-चुनाव खेलते हैं..'/><category term='चुनाव'/><title type='text'>बात बोलेगी, हम भी बोलेंगे</title><subtitle type='html'>..ब्लॉग बहुत कुछ डायरी के पन्नों की तरह लगता है, लेकिन डायरी की तरह इसे पढ़ने वाले आप खुद ही नहीं होते। आपका अपना निजी कुछ नहीं होता, कई सारी बातें आप दूसरों से छुपा नहीं सकते। लेकिन कौन कमब्ख़त छुपाने के लिए ब्लॉगिंग करता है। मैं तो इसकी इसी खूबसूरती पर कुर्बान हूं।</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>30</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-7066499068335278713</id><published>2011-04-09T01:56:00.019+05:30</published><updated>2011-04-09T02:47:14.005+05:30</updated><title type='text'>पेज-थ्री भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन उर्फ गंवाना मौका दूसरा जेपी बनने का</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-cOk7b5i4rGw/TZ92D8h8kOI/AAAAAAAAAP4/uf-8eWCBt3U/s1600/08042011274.JPG" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;/a&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;फुट नोट -&lt;/b&gt; अन्ना हजारे एवं साथियों के आंदोलन ने कई सालों से &lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;i&gt;मेरे भीतर &lt;/i&gt;&lt;i&gt;सोए पड़े एक्टिविस्ट को कुछ देर के लिए निश्चित रूप से जगा दिया। इस भाव को जान-बूझ कर कई सालों से मैं दबाता चला आ रहा था क्योंकि इससे उपजी उत्तेजना अगले कई दिनों तक मुझे असामान्य बनाए रखती है। लेकिन मेरे भीतर का एक्टिविस्ट फिर जग गया है .. चिर-विद्रोही मैं, थोड़े दिनों के लिए ही सही, फिर से सामने हूं। आप मेरी बातों का समर्थन करें या विरोध, वो आपकी भावना है और मैं उसका सम्मान करता हूं/करूंगा।&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;img src="http://3.bp.blogspot.com/-cQKka0iYefI/TZ9x_V4UMuI/AAAAAAAAAOw/rCPRcXxadCM/s200/05042011245.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593314595236492002" style="float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; cursor: pointer; width: 200px; height: 150px; " /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;जी हां, अन्ना हजारे के आंदोलन के साथ ऐसा ही हुआ, ऐसा ही होने जा रहा है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;लोगों ने भरपूर समर्थन दिया इस आंदोलन को लेकिन ये तो बस इतनी सी बात को लेकर था कि आंदोलनकारियों द्वारा दिए गए जन लोकपाल बिल को सरकार मंजूरी दे। सरकार ने मंजूरी तो नहीं दी, बस एक कमिटी बना दी और आंदोलनकारियों के नेता वर्ग को उसका सदस्य बना दिया। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;अब फिर से ये सारी बातें नौकरशाही के अंदाज में चलेंगी, मीटिंग पर मीटिंग, मीटिंग पर मीटिंग (सन्नी देओल के तारीख पर तारीख के ही अंदाज में) और नतीजा निकलेगा वही - ढ़ाक के तीन पात। नौकरशाही को सब्र रखना आता है, उसे ये पता है कि इस तरह के आंदोलनों से निपटने का सबसे अच्छा तरीका है - धैर्य। धीरज धरो, मामले को इतना लंबा खींच दो कि ये कभी खत्म न होने पावे (हरि अनंत, हरिकथा अनंता की तरह)। अब फिर से ये सारी बातें वर्षों तक सत्ता के गलियारों में मीटिंग्स के जरिए चलेंगी और चलती रहेंगी। नतीजा कुछ नहीं निकलने वाला।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;मैं दुआ करूंगा कि मेरी बात झूठ निकले लेकिन मुझे उसके आसार कम ही नजर आते हैं। सत्ता तंत्र को पिछले कुछ सालों से काफी करीब से देखा और समझा है मैंने और मेरी समझ यही कहती है कि मुद्दा गया अब डस्टबिन में। ध्यान दीजिएगा कि जिस समिति को बनाने की घोषणा हुई है, उसको अपनी बातें और विचार-विमर्श खत्म करने के लिए कोई समय सीमा नहीं दी गई है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://2.bp.blogspot.com/-_L1fCmUwbxk/TZ9xYMhEedI/AAAAAAAAAOg/Xgc4YDSveJ8/s200/08042011269.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593313922708175314" style="float: left; margin-top: 0px; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; cursor: pointer; width: 200px; height: 150px; " /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;मैं इसीलिए निराश हूं। मैंने इस आंदोलन का समर्थन अपनी सारे नकारात्मक धारणाओं के बावजूद किया था, क्योंकि इसके जरिए बदलाव की एक नई आशा की तलाश कर रहा था मैं। समय साक्षी है और रहेगा कि मेरी शंकाएं सत्य थीं और आगे भी रहेंगी। &lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;निराश हूं क्योंकि मुझे लगा था कि बरसों बाद एक ऐसा मौका आया है जब भ्रष्टाचार या हमारी-आपकी रोज की कठिनाईयों पर सरकार को हिलाया जा सकता है। अन्ना हजारे साहब के आंदोलन को लगातार बढ़ते जा रहे जन समर्थन ने मेरी इस धारणा को पुष्ट ही किया था। चार दिनों से लगातार मैं इस बात का साक्षात्कार कर रहा था। कल शाम में तो विरोध के एक नए अंदाज को देख कर मैं आह्लादित हो उठा था। &lt;b&gt;विरोध का नया अंदाज था लोगों को थाली-चम्मच बजाते हुए मार्च करना, मानों कह रहे हों कि मेरे घर का सारा राशन तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया, अब थाली-चम्मच बजाने के सिवाय कोई और रास्ता ही नहीं बचा।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;लेकिन आंदोलन तो बस एक मुद्दे को लेकर था कि जन-लोकपाल बिल को मंजूर किया जाय। सरकार ने इसे मंजूर नहीं किया, बस एक समिति बना दी और आंदोलन के कर्ता-धर्ताओं ने आंदोलन समाप्ति की घोषणा कर दी। &lt;b&gt;मानों इस आंदोलन के जरिए अन्ना हजारे एवं साथियों ने अपने को सत्ता तंत्र के सामने विज्ञापित किया कि मैं खरीदे जाने के लिए तैयार हूं, बस मेरे सामने हड्डी का एक टुकड़ा फेंक दो। &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;मुझे ऐसा ही होता दिख रहा है और इसका मुझे अफसोस है। ये बात अलग है कि अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी कह रही हैं कि ऐसा नहीं है और अगर ऐसा होता दिखा, तो फिर से आंदोलन का रास्ता अख्तियार करेंगे।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://1.bp.blogspot.com/-Ninacbm-MN8/TZ9ycAbTI7I/AAAAAAAAAPA/3dwSvPZVUNs/s200/08042011259.JPG" style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593315087693849522" /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;वाह, साहब, वाह। अरे एक बार भरोसा टूटने के बाद कोई आपका साथ देने आएगा? लोगों को आपने इतना बेवकूफ समझा है क्या आपने। &lt;b&gt;लोगों या जनता का समर्थन आपको इसलिए मिला था कि उसे लगा था कि बरसों बाद अपनी पीड़ा को सही मंच पर अभिव्यक्त करने मौका मिला है। &lt;/b&gt;जनता इसीलिए आपसे जुड़ी थी और लगातार जुड़ रही थी। ये थाली-चम्मच मार्च अभिव्यक्ति की इसी नई भाषा को लेकर आया था और आपने उसे यूं ही जाने दिया। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;होना तो ये चाहिए था कि आम जनता से मिले और लगातार मिल रहे समर्थन को भ्रष्टाचार और इस तरह के दूसरे मुद्दों के खिलाफ लगातार और दीर्घ समय तक चलने वाली लड़ाई के आधार के रूप में इस्तेमाल किया जाता। लेकिन ऐसा करना शायद आंदोलन के कर्ता-धर्ता चाहते ही नहीं थे। उन्हें तो हड्डी के उस टुकड़े से मतलब था जिसके फेंके जाने का वो इंतजार कर रहे थे। &lt;b&gt;और इसीलिए ये आंदोलन दिशाहीन था और शायद इसीलिए ये आंदोलन हमारा 'ट्यूनीशिया मूवमेंट ऑफ विक्टरी' नहीं बन पाया या पाएगा। &lt;/b&gt;अपनी रोटी सेंक कर आंदोलन के कर्ता-धर्ता इससे अलग हो गए, भले ही इसके लिए उन्हें जनता को बरगलाना पड़ा हो। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;अगर ये आंदोलन सही दिशा में जा रहा होता तो अन्ना हजारे को अनशन करने के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर की जरूरत नहीं पड़ती, अहमदनगर में बैठे-बैठे वो सत्ता तंत्र को हिला सकते थे &lt;b&gt;(जैसे कि पटना में होते हुए जेपी ने इंदिरा सरकार को हिलाया था)&lt;/b&gt;। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आंदोलन तो हड्डी पाने के लिए था, वो मिल गया। अगर ऐसा नहीं होता तो अन्ना हजारे साहेब के आंदोलन के साथ-साथ देश के हर हिस्से में इस तरह के छोट-छोटे आंदोलन हो सकते थे और क्रमश: वो एक बड़े और निर्णायक आंदोलन की नींव रख सकते थे। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-TOGz39jCtIU/TZ9yK2q06ZI/AAAAAAAAAO4/R19DyzgpChc/s1600/05042011251.JPG" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img src="http://1.bp.blogspot.com/-TOGz39jCtIU/TZ9yK2q06ZI/AAAAAAAAAO4/R19DyzgpChc/s200/05042011251.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593314793016846738" style="float: left; margin-top: 0px; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; cursor: pointer; width: 200px; height: 150px; " /&gt;&lt;/a&gt;&lt;b&gt;लेकिन ये तो पेज-थ्री आंदोलन था भ्रष्टाचार के खिलाफ&lt;/b&gt;, सत्ता के गलियारों में आकर विरोध जताना, मीडिया की चकाचौंध में अपनी बात रखना और हड्डी के टुकड़े को पाते ही इसके समापन की घोषणा कर देना। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;ऐसा नहीं है कि मैं नहीं चाहता था या हूं कि अन्ना साहेब का अनशन खत्म हो। अनशन खत्म जरूर होना चाहिए, लेकिन आपको जिस प्रकार से जनता ने उनको समर्थन दिया, उसका सम्मान करते हुए उन्हें आंदोलन को एक दीर्घकालीन आंदोलन में बदल देना चाहिए था और ये आंदोलन तब तक चलना चाहिए था जबतक कि उसकी स्वाभाविक परिणति न हो जाए यानी भ्रष्टाचार के खिलाफ जीत न मिल जाए। &lt;b&gt;निश्चित तौर पर इस लड़ाई की स्वाभाविक परिणति एक समिति का गठन होना भर नहीं है। &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;सत्ता तंत्र इस बात को बखूबी समझता था और इसीलिए तो लड़ाई जिनके खिलाफ लड़ी जा रही थी, वो ही लोग इसके समर्थन में आ गए। तभी तो केंद्र सरकार का एक मंत्री इसके समर्थन में इस्तीफे की घोषणा करता है, और तभी तो पूरा कॉरपोरेट जगत कुंभकर्णी नींद से जागते हुए कहता है कि भ्रष्टाचार से हम भी त्रस्त हैं और आपकी लड़ाई को हम अपना समर्थन देते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;होना ये चाहिए था कि अन्ना हजारे देश की जनता का आह्वान करते कि आप सब अपनी-अपनी जगह पर अपने-अपने तरीके से इस लड़ाई को आगे बढ़ाएं, छोटे-छोटे समूहों और गुटों में। थकें नहीं, डटे रहें, हम सब आपके साथ हैं और भरोसा दिलाते हैं कि हम भी पीछे नहीं हटेंगे। जन लोकपाल तो एक बहाना है, जब तक मूल मुद्दे का हल नहीं होगा तब तक हम पीछे नहीं हटेंगे। &lt;b&gt;विश्वास कीजिए, अगर अन्ना हजारे इस तरह का आह्वान करते तो इस देश की जनता सड़कों पर आ जाती। लोग मानसिक रूप से इसके लिए तैयार हो ही रहे थे कि आंदोलन के समाप्ति की घोषणा कर दी गयी। &lt;/b&gt;इसलिए हमारे देश में वो 'ट्यूनीशिया मूमेंट ऑफ विक्टरी' नहीं आ पाया।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;img src="http://4.bp.blogspot.com/-V96-qAP4QQc/TZ913Ekeo7I/AAAAAAAAAPw/BpDzr_Ohuoo/s200/08042011273.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593318851197445042" style="float: left; margin-top: 0px; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; cursor: pointer; width: 200px; height: 150px; color: rgb(0, 0, 238); -webkit-text-decorations-in-effect: underline; " /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;लेकिन फिर भी मैं मानता हूं कि जनता बेवकूफ नहीं होती। उसे नए-नए तरीकों से आप ठग सकते हैं लेकिन एक ही तरीके से दूसरी बार नहीं ठग सकते। न्याय-अन्याय की बात सबसे ज्यादा आम जनता ही समझती है क्योंकि उससे जुड़े हुए दुख-दर्दों को सबसे ज्यादा वही झेलती है। ये अलग बात है कि जनता राजनीतिज्ञों और बुद्धिजीवियों की तरह मंच बना कर अपनी बात नहीं रखती &lt;b&gt;लेकिन जब भी उसे भरोसा करने लायक एक मंच मिलता है, वो अपनी बात निर्णायक रूप से रख देती है।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-qA2Rrrxjzgs/TZ9ylKacUpI/AAAAAAAAAPI/Y_rPOxEKimU/s1600/08042011271.JPG" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img src="http://2.bp.blogspot.com/-qA2Rrrxjzgs/TZ9ylKacUpI/AAAAAAAAAPI/Y_rPOxEKimU/s200/08042011271.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593315244993434258" style="float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; cursor: pointer; width: 200px; height: 150px; " /&gt;&lt;/a&gt;नहीं तो क्या मौजूदा सत्ता तंत्र को अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और प्रशांत भूषण जैसे लोगों का डर था कि चार दिनों में ही समझौता करने को ये लोग तैयार हो गए। नहीं। ये उसी आम जनता का डर था, जिससे सत्ता तंत्र को झुकना पड़ा। सत्ता तंत्र सबसे ज्यादा आम जनता से ही डरता है और कोई भी शासन तंत्र आम जनता की आवाज को उठने नहीं देता, नहीं देना चाहता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;आप बिठा दीजिए आडवाणीजी, बाबा रामदेव, श्री श्री रविशंकर या ईमानदार कहलाने वाले खुद प्रधानमंत्री महोदय को आमरण अनशन पर। मुझे 200 प्रतिशत विश्वास है कि हम लोग, आम जनता, उनके अनशन का इस आंदोलन की तरह समर्थन नहीं करेगी। वजह इतनी है कि जनता अपने प्रति हो रहे न्याय-अन्याय की बात को सबसे अच्छे से जानती है और वो ये भी जानती है कि उसके प्रतिरोध को आवाज देने के लिए कौन सा मंच कब उभर रहा है और कौन उसकी बात को सबसे अच्छी तरह से रखेगा।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-efCsRReHvnw/TZ9y6HTmm1I/AAAAAAAAAPY/Gp5juH-VG4g/s1600/08042011272.JPG" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img src="http://4.bp.blogspot.com/-efCsRReHvnw/TZ9y6HTmm1I/AAAAAAAAAPY/Gp5juH-VG4g/s200/08042011272.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593315604936694610" style="float: left; margin-top: 0px; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; cursor: pointer; width: 200px; height: 150px; " /&gt;&lt;/a&gt;इसलिए मैं अपने कुछ मित्रों की तरह इस देश के भविष्य को अंधकारमय नहीं मानता हूं। &lt;b&gt;मुझे देश का भविष्य अच्छा दिखता है, खास कर तब जब इस तरह के आंदोलन को जनता का समर्थन मिले। &lt;/b&gt;ठीक है कि जनता के समर्थन को एक व्यापक रूप अन्ना हजारे नहीं दे पाए, ये उनकी कमजोरी है और पहले से रही है। लेकिन फिर भी जनता ने अगर उनको अपनी सहानुभूति भी दी, और वो भी इतने बड़े पैमाने पर तो ये मुझे आशवस्त करता है कि देश का भविष्य अंधकारमय नहीं है। लेकिन, जैसा कि मैं कह रहा हूं कि ये आंदोलन दिशाहीन था, एक ही मुद्दे पर केंद्रित था और इसलिए मेरा इससे विरोध था और है। लेकिन मैं इसके समर्थन में भी था क्योंकि मुझे लगा था कि शायद जयप्रकाश आंदोलन के बाद शायद ये पहला ऐसा आंदोलन था, जिससे जनता अपने मन से जुड़ी। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://1.bp.blogspot.com/-cOk7b5i4rGw/TZ92D8h8kOI/AAAAAAAAAP4/uf-8eWCBt3U/s200/08042011274.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593319072377639138" style="float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; cursor: pointer; width: 200px; height: 150px; color: rgb(0, 0, 238); -webkit-text-decorations-in-effect: underline; " /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;b&gt;जयप्रकाश नारायण से कई तरह का साम्य रखते हुए भी अन्ना हजारे ने दूसरा जेपी बनने का मौका खो दिया। &lt;/b&gt;यही उनमें और जयप्रकाश में अंतर है, था और रहेगा।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;बहस इस बात पर भी की जा सकती है कि जेपी आंदोलन से ही देश को क्या मिला। सही बात है, हमें कुछ नहीं मिला और जनता उस समय भी ठगी गई थी। लेकिन इस तरह से आंदोलन के शुरूआत में ही नहीं। वो तो जेपी आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं ने बाद में जनता को ठगा (इस बार की तरह ही सत्ता तंत्र से फेंके गए हड्डी को लपक कर और बाद में वे सारे लोग शासक वर्ग का ही हिस्सा हो कर रह गए)। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" &gt;इसलिए इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि इस बार भी वैसा नहीं होगा। लेकिन एक आशा थी कि शायद अतीत से सबक लेकर हम अपने वर्तमान और भविष्य को वैसा बनने से रोक पाएं। लेकिन इस बार के आंदोलन को तो विकसित होने देने से पहले खुद आंदोलनकर्ताओं ने ही कुचल दिया, तो &lt;b&gt;फिर रोइए ज़ार-ज़ार क्यों, कीजिए हाय-हाय क्यों? &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-7066499068335278713?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/7066499068335278713/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=7066499068335278713' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/7066499068335278713'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/7066499068335278713'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2011/04/blog-post_09.html' title='पेज-थ्री भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन उर्फ गंवाना मौका दूसरा जेपी बनने का'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-cQKka0iYefI/TZ9x_V4UMuI/AAAAAAAAAOw/rCPRcXxadCM/s72-c/05042011245.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-705406661816330288</id><published>2011-04-07T01:53:00.008+05:30</published><updated>2011-04-07T02:26:12.889+05:30</updated><title type='text'>अन्ना हजारे का समर्थन क्यों जरूरी है?</title><content type='html'>&lt;img src="http://4.bp.blogspot.com/-Dn_1eNTU6iU/TZzPOoofORI/AAAAAAAAAN4/ZyzbTX6E9XM/s200/05042011246.JPG" style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 150px; height: 200px;" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5592572687619668242" /&gt;मैं कोई क्रांतिकारी नहीं हूं, क्रांतिद्रष्टा कवि नहीं हूं, टाटा-बिड़ला-अंबानी के घर पैदा नहीं हुआ। इस देश का एक अदना सा नागरिक हूं और धर्म, जाति, राजनीति - ये सब मेरे लिए निजी आस्था-अनास्था का विषय है। मैं इन सब पर बात भी नहीं करना चाहता हूं। फिर भी, मुझे लगता है कि मुझे अन्ना हजारे की मुहिम का समर्थन करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;क्यों?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ये एक ऐसा सवाल है जिससे मैं जूझ रहा हूं, उत्तर नहीं है मेरे पास। बहुत ऊहापोह है मन में। फिर भी लगता है कि मुझे समर्थन करना चाहिए। मुझे पता है कि अन्ना साहेब ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जन लोकपाल विधेयक को सरकारी स्वीकृति दिलाने के लिए आमरण अनशन शुरू किया है और इस बात को बीते दो दिन हो चुके हैं। मुझे ये भी मालूम है कि सरकारी तंत्र, राजनीतिक तंत्र इससे बौखलाया हुआ है। मुझे ये भी मालूम है कि मीडिया को अगले कुछ दिनों के लिए बढ़िया मसाला मिल गया है और चैनलों से लेकर अखबारों तक, अखबारों से लेकर इंटरनेट जैसे न्यू मीडिया माध्यमों तक ये तमाशा अगले कुछ दिनों तक चलता रहेगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://4.bp.blogspot.com/-52P7p65qykc/TZzPnyk-cnI/AAAAAAAAAOA/LApn9nr6zn4/s200/05042011247.JPG" style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5592573119786021490" /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि मुझे इस मुहिम का समर्थन करना चाहिए। न केवल इस मुहिम का, बल्कि अन्याय और अत्याचार के खिलाफ चलने वाले हर मुहिम का। चाहे वो किसी भी रंग-रूप में सामने आए पर अगर मुझे लग&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ता है तो लगता है। मैं करूंगा, जरूर समर्थन करूंगा, कर रहा हूं, करता रहूंगा।  &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अन्ना हजारे साहब भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं, हो सकता है कि उनका भी अपना कोई एजेंडा हो और उसके तहत वो काम कर रहे हों (नहीं तो इतने दिनों बाद दिल्ली में अनशन करने की उन्हें एकाएक क्यों सूझी?)। अपने कुछ मित्रों की दलील दूं तो इस आंदोलन से अन्ना क्या उखाड़ लेंगे? भ्रष्टाचार तो यूं ही बना रहेगा, भले ही प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति उसके दायरे में आ जाएं। बात सही है। फिर भी मैं समर्थन करता हूं इस मुहिम का। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;क्यों? इसलिए कि इसमें मुझे एक शुरूआत दिखती है .. शुरूआत दिखती है देश की समस्याओं से लड़ने के प्रति। हम सब इतने जड़ हो गए हैं कि हमारा दायरा अपने-आप तक सीमित होता चला गया है, मैं..मेरी पत्नी..बच्चे..परिवारजन..मित्र वर्ग..दफ्तर। हमारी दुनिया यहीं तक सीमित हो गयी है .. इससे आगे हम सोच ही नहीं पाते।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://3.bp.blogspot.com/-nt7vXRg1X0k/TZzQYGiQopI/AAAAAAAAAOY/OKVbV8uY638/s200/05042011258.JPG" style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5592573949777060498" /&gt;&lt;div&gt;हम देख रहे हैं कि हमारे सामने कुछ गलत हो रहा है और हम उसके खिलाफ आवाज नहीं उठाते। हम प्रतीक्षा में बैठे हैं कि कोई महापुरूष आएंगे और हमारी सारी व्यक्तिगत, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक समस्याओं का समाधान कर देंगे। शायद तभी इस देश में महापुरूषों की संख्या कुछ ज्यादा ही हैं और शायद इसीलिए भगवानों ने भी कई अवतार लिए। व्यक्तिपूजा की परंपरा वाले इस देश में अभी भी यही तो चल रहा है, भले ही उसका स्वरूप कुछ अलग हो गया हो।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन मैं केवल शुरूआत तक रूकना नहीं चाहता। मेरी आंकाक्षाएं इससे कई ज्यादा गुनी बड़ी हैं। मैं चाहता हूं कि भ्रष्टाचार के नाम पर शुरू हुई ये मुहिम और व्यापक रूप ले, इतना व्यापक बने कि ये ब्लैक होल बन जाए और समस्याएं इस ब्लैक होल में विलीन हो जाएं। समस्याएं तो यूं ही सुरसा की तरह अपना मुंह फाड़े खड़ी रहेंगी, लेकिन उन्हें सुलझाने के बजाय हम उनसे कतरा के निकल जाते हैं। मैं उम्मीद लगाए बैठा हूं कि ये शुरूआत एक नव जन-जागरण के रूप में बदले और इसी नव जन-जागरण की जरूरत इस वक्त हमें सबसे ज्यादा है। मैं चाहता हूं कि ये शुरूआत एक नए जन-आंदोलन का रूप ले, पुरानी सारी मान्यताओं, पुरानी सारी परंपराओं को ध्वस्त कर दे। मैं चाहता हूं कि ये एक नई भाषा का सृजन करे, नए समाज की स्थापना करे, नए युग का मार्ग प्रशस्त करे। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन मैं निराश भी हूं। मेरे अनुभव कहते हैं कि ये मुहिम भले ही सफल हो जाए पर इससे फायदा नहीं होने वाला है। व्यर्थ की आशा रखने से कोई फायदा नहीं होने वाला। मैं दो दिनों से जंतर-मंतर जा रहा हूं, उस नव की तलाश में जिसकी बात मैं कर रहा हूं। मैं दो दिनों से उस नव की एक किरण वहां जाकर ढूंढ़ता रहा हूं,  निराश और क्षुब्ध हो कर लौटता रहा हूं। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जंतर-मंतर जाकर लगता है कि ये बस एक भीड़ है, कि यहां कुछ लोग अपने एजेंडे के साथ मौजूद हैं और उसे पूरा करवाने के लिए उन्होंने ये छद्म भेष धारण कर रखा है। मुझे आशा की कोई एक किरण अबतक नहीं दिखी। जंतर-मंतर जाता हूं तो लगता है कि जैसे किसी मेले में चला आया हूं जहां लोग उत्सव मना रहे हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नहीं तो क्या कारण है कि अन्ना हजारे जैसा शख्स, जिसने अपना जीवन लोगों का भला करने में बिता दिया हो, उसे ये आंदोलन करने के लिए दिल्ली आना पड़ता। अन्ना अहमदनगर में होते हुए भी ये आंदोलन कर सकते थे। लेकिन नहीं, तब शायद उन्हें वो प्रसिद्धि, वो विज्ञापन नहीं मिलता जो सत्ता तंत्र के करीब आकर मिल रहा है। दिल्ली में आंदोलन करने का मतलब है कि आप सत्ता तंत्र से जो चाहते हैं, उसको विज्ञापित कर रहे हैं और लोगों को भुलावे में रख कर अपना हित साध रहे हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दिल्ली में सत्ता तंत्र है, मीडिया की चकाचौंध है, खा-खा कर उबे हुए लोगों की फौज है। इन्हें ही तो ये मैसेज दिया जा रहा है कि चाहे जितना खाओ पर नाम के लिए ही सही पर उसे एक कानून के दायरे में लाओ। नहीं तो क्या कारण है कि इस आंदोलन के साथ पूरे देश की जनता आ के खड़ी नहीं हुई। नहीं तो क्या कारण है कि मुहिम के समर्थकों से ज्यादा जंतर-मंतर पर मीडिया और पेज-थ्री-एनजीओ वालों की भीड़ है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;होना तो ये चाहिए था कि अगर अन्ना हजारे साहब आमरण अनशन पर बैठ रहे हैं, तो देश के हर कोने में इस तरह के मुहिम की शुरूआत की जाती। छोटी-छोटी शुरूआत, पांच लोगों से, दस लोगों से। हर राज्य की राजधानी में, हर शहर में, हर कस्बे में छोटे-छोटे जन-आंदोलनों से इसकी शुरूआत की जाती और एक से भले दो, दो से भले चार की तर्ज पर लोगों को जोड़ते हुए इसे एक ऐसा रूप दिया जाता कि अहमदनगर में बैठे अन्ना हजारे से ही सत्ता तंत्र डर जाता।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन ऐसा नहीं हुआ, न ही ऐसा होता हुआ दिख रहा है। तभी तो अन्ना साहेब को दिल्ली आना पड़ा। शायद आंदोलन की कमजोर जड़ के कारण ही इस मुहिम के समर्थन में पूरा महाराष्ट्र भी खड़ा हुआ नजर नहीं आता (अन्ना साहेब जहां के रहने वाले हैं)।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;होना ये चाहिए था कि इसे एक विशाल जन-आंदोलन की भूमिका के रूप में प्रस्तुत किया जाता और विभिन्न मुद्दों को एक मंच पर लाने की एक ईमानदार पहल की जाती। लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है, ना ही किसी के मन में ऐसी कोई भावना नजर आ रही है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ये आंदोलन तो फिलहाल पेज-थ्री-एनजीओज की जकड़ में लगता है, बड़े-बड़े लोग आते हैं, भाषण देते हैं, क्रांति के गीत गाते हैं और चले जाते हैं। मुझे तो ऐसे भी लोग मिले जंतर-मतंर पर पिछले दो दिनों में, जिनके मुंह से दिन में भी शराब की गंध आ रही थी। और ऐसे लोगों की संख्या तो बहुत ज्यादा थी जो मंच के ठीक सामने की दुकानों से पानी खरीद-खरीद कर पी रहे थे और उन्हें वो एक रूपये में एक ग्लास पानी बेचने वाला नजर नहीं आ रहा था। लोग गर्मी को दूर करने के लिए कोक-पेप्सी पी रहे थे। मैं उनकी बात नहीं कर रहा जो मेरी तरह महज तमाशबीन थे, मैं उनकी बात कर रहा हूं जो इस आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता हैं, इस आंदोलन के बैच लगाए घूम रहे हैं या फिर इस आंदोलन से सहानुभूति रखने का दावा कर रहे हैं। इस आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता पोज बना-बना कर टीवी चैनलों को इंटरव्यू दे रहे थे। ऐसे में, एक नई शुरूआत भला खाक होगी।&lt;/div&gt;&lt;img src="http://3.bp.blogspot.com/-Ird-cEMJ9V8/TZzQA5qVnYI/AAAAAAAAAOI/PYuWzwmBoBU/s200/05042011252.JPG" style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5592573551184289154" /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मैंने कुछ मित्रों को अपने विचारों से अवगत कराने की कोशिश की तो उन्होंने इसे हंस कर टाल देना बेहतर समझा। इस आंदोलन के बारे में मेरी समझ तो यही कहती है कि ये जमीन से जुड़ने के बजाय मीडिया और पेज-थ्री-एनजीओज से ज्यादा जुड़ा हुआ है और इसके जरिए ज्यादातर लोग अपना फायदा सोच रहे हैं। भविष्य की स्पष्ट रूप-रेखा मुझे तो किसी के भी पास नहीं मिली है अबतक।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अपने पत्रकार मित्रों की बात करें तो उनमें बहुत थोड़े हैं जिन्हें इस मुहिम के मकसद से कुछ लेना-देना है। ज्यादातर तो दिन भर चलने वाले तमाशे की कवरेज कर रहे हैं। वे इसे कवर कर रहे हैं, क्योंकि उनका बॉस चाहता है। बॉस चाहता है क्योंकि इससे उसे कुछ दिनों के लिए एक तमाशा मिल रहा है और वो भी बिना मेहनत के। अखबारों के पहले पन्ने से लेकर न्यूज चैनलों के पैकेज और टॉक-शोज़ तक - "आज अन्ना के अनशन का दूसरा दिन है और आप देख रहे हैं कि मंच पर अन्ना लेटे हुए हैं, उनके साथ स्वामी अग्निवेश हैं, दिन में उमा भारती भी आईँ थीं, किरण बेदी और केजरीवाल साहब तो कल से ही यहां डटे हुए हैं।"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;img src="http://1.bp.blogspot.com/-1dBaOq-GsoM/TZzQOPj6p0I/AAAAAAAAAOQ/2ms9SCONy0c/s200/05042011254.JPG" style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5592573780401235778" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मुझे मालूम है कि ये चार दिनों का तमाशा है और उसके बाद सबके ओ.बी वैन चले जाएंगे, इक्का-दुक्का रिपोर्टर बच जाएंगे, ये खबर अखबारों के पहले पन्ने से उतर कर भीतर के पन्नों में कहीं गुम हो जाएगी। खुदा-ना-खास्ता, अगर अनशन 12-13 दिनों से ज्यादा चला तो ये सारा मीडियावर्ग लौट कर आ जाएगा और कहेगा कि "सरकार की बेरूखी की वजह से अन्ना मौत के कगार पर। 12 दिनों से अन्न का एक दाना नहीं लिया है अन्ना हजारे ने और पत्थरदिल सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंग रही" । लेकिन इस बीच में कोई नहीं झांकने आएगा, कोई स्टूडियो डिस्कशन इस पर नहीं होगा, कोई संपादकीय इस पर नहीं लिखा जाएगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लेकिन फिर भी मैं इस मुहिम का, इस आंदोलन का समर्थन करता हूं। मुझे आशा की एक किरण दिखी है, लोगों को उनकी जड़ता से निकालने का एक बेहतरीन मौका दिख रहा है। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सवाल ये है कि हम इस मौके का कैसे उपयोग करते हैं .. एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप देकर या इसे बस एक विषय तक ही लिमिटेड रख कर। अपनी सारी नकारात्मकताओं के बावजूद मैं इसे एक नई और अच्छी शुरूआत मानता हूं, चाहता हूं कि ये शुरूआत एक व्यापक रूप ले और देश के कोने-कोने में फैल जाए। ये होता नहीं दिख रहा है, लेकिन मैं फिर भी उम्मीद लगाए बैठा हूं। ये आशावाद मैं आने वाले दिनों में भी बरकरार रखने की कोशिश करूंगा, हर दिन जंतर-मंतर जाऊंगा उस एक किरण की उम्मीद में, जिसकी आस मैं लगाए बैठा हूं। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;और इसीलिए मैं इस मुहिम का समर्थन करता हूं, इसीलिए मैं कहता हूं कि हम सब लोगों को अन्ना हजारे के इस आंदोलन का समर्थन करना चाहिए। महापुरूषों के इस देश में सबसे ज्यादा अकाल इस वक्त महापुरूषों का ही है। हमारे महानायक इस वक्त अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर और एम एस धोनी जैसे लोग हैं, जिन्होंने शायद ही भूख, अकाल और गरीबी देखी होगी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;हम सब अपने-अपने महापुरूष के आने का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में, मैं मानता हूं कि अन्ना हजारे जैसा शख्स हमारे युग का महापुरूष है और अगर ये शख्स भी इस देश को, इस देश के लोगों को जड़ता, किंकर्त्वयविमूढ़ता की स्थिति से बाहर नहीं निकाल पाया तो पता नहीं फिर ऐसे दिन, ऐसे मौके फिर कब लौट कर आएंगे। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;केवल कहने से नहीं होगा कि 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है', ऐसा हमें करके दिखाना होगा। तभी इस आंदोलन की सार्थकता साबित होगी और तभी ये आंदोलन जन-मानस को भी भागीदार बना पाएगा। अच्छी हिंदी और उसके उपमाओं का प्रयोग करते हुए पूछना चाहता हूं क्या यज्ञ की इस वेदी पर हम अपनी आहुति देने के लिए तैयार हैं ?&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-705406661816330288?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/705406661816330288/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=705406661816330288' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/705406661816330288'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/705406661816330288'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='अन्ना हजारे का समर्थन क्यों जरूरी है?'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-Dn_1eNTU6iU/TZzPOoofORI/AAAAAAAAAN4/ZyzbTX6E9XM/s72-c/05042011246.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-2240304491817498019</id><published>2010-04-07T00:57:00.021+05:30</published><updated>2010-04-07T14:38:36.913+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राम के बहाने'/><title type='text'>राम के बहाने रामकथा और भारतीय इतिहास का पुनर्पाठ - कुछ प्रश्न</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7uS2vmuWlI/AAAAAAAAAMc/h45KG_H_tU8/s1600/Ram-Laxman-Sita+in+jungle.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 217px; FLOAT: left; HEIGHT: 196px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5457116842678966866" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7uS2vmuWlI/AAAAAAAAAMc/h45KG_H_tU8/s200/Ram-Laxman-Sita+in+jungle.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;em&gt;&lt;a href="http://janatantra.com/"&gt;जनतंत्र &lt;/a&gt;में &lt;/em&gt;&lt;a href="http://janatantra.com/author/mukesh-kumar-singh/"&gt;&lt;em&gt;मुकेशजी&lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt; ने रामनवमी के मौके पर &lt;a href="http://janatantra.com/2010/03/26/mukesh-kumar-singh-on-ram-ravan-and-women/"&gt;राम के चरित्र &lt;/a&gt;की अपनी तरह से व्याख्या की। और विवाद तो उठना ही था क्योंकि एक अरब बीस करोड़ लोगों के देश में एक कहावत है कि अपनी अक्ल और दूसरे की जोरू सबको प्यारी लगती है। मुझे भी अपनी अक्ल प्यारी लगती है। लिहाजा मैंने भी अपनी प्रतिक्रिया लिख डाली। उसी का थोड़ा संशोधित संस्करण यहां डाल रहा हूं। एक अरसे के बाद ब्लॉग पर कुछ पोस्ट क&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7uRwTnWDfI/AAAAAAAAAMM/cfeVVo4oYJ8/s1600/Ram+1.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 149px; FLOAT: right; HEIGHT: 302px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5457115632574533106" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7uRwTnWDfI/AAAAAAAAAMM/cfeVVo4oYJ8/s200/Ram+1.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;रना अच्छा लग रहा है। &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;" राम के बहाने रामकथा, भारतीय इतिहास का पुनर्पाठ - कुछ प्रश्न? "&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पहले तो ये तय किया जाय कि राम थे या नहीं ... उनकी ऐतिहासिकता कितनी प्रमाणित की जा सकती है / कैसे प्रमाणित की जा सकती है .. लोकगाथा के अंग वे कैसे बने .. क्या कई सारे व्यक्तित्वों को मिला कर एक आदर्श तो नहीं गठित किया गया या श्रुति परंपरा के दिनों में कई बातें समय के साथ यूं ही तो नहीं जुड़ती गईं ? &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;इस तरह के न जाने कितने प्रश्न हो सकते हैं ... राम कथा इतिहास है, साहित्य है , दोनों का मिश्रण है या सदियों तक विकसित होते-होते आज के रूप में पहुंचा ... ये भी तय करना पड़ेगा कि किस राम को मानें - वाल्मीकि के राम को, तुलसी के राम को या हमारे समय की कुछ व्याख्याओं को - नरेंद्र कोहली के राम को, भगवान सिंह के अपने-अपने राम को ...। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;राम के ऊपर इतना लिखा जा चुका है कि पहले ये तो तय करना पड़ेगा कि किसके राम, किस समय के राम ? जिस किसी के राम को मानें उसकी प्रामाणिकता को परखेंगे कैसे? राम के किस पाठ को मानें और उस पाठ की प्रामाणिकता कौन तय करेगा? &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7uTfPv8uiI/AAAAAAAAAMk/MPzzlLb0o3s/s1600/Ram-Sita.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 145px; FLOAT: left; HEIGHT: 200px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5457117538502359586" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7uTfPv8uiI/AAAAAAAAAMk/MPzzlLb0o3s/s200/Ram-Sita.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;केवल अपने पुरखों से, समाज से सुन कर मैं उसे आंखें बंद करके मान लूं तो लानत मेरे सोचने-समझने की शक्ति पर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धर्म मेरे लिए निजी आस्था का विषय है, नरेंद्र कोहली ने अपना रामकथा में राम के व्यक्तित्व को जो रुप दिया है, जिस तरह से विकसित किया है ... उसके आधार पर मैं राम को मर्यादा पुरूषोत्तम या महानायक मानने के तैयार हूं। इसमें राम का मानवीय रूप बहुत अच्छे से विकसित होता है। इस किताब को मैंने पचासों बार पढ़ा है.. जब भी पढ़ता हूं राम से प्रेरित होता हूं .. जब भी किसी मुसीबत में होता हूं रामकथा का यही पाठ/यही विश्लेषण याद आता है, प्रेरित करता है मुसीबतों का सामना करने के लिए। &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7uVQdWCWQI/AAAAAAAAAM0/LND1XoH29LQ/s1600/lord_vishnu_brahma_hanuman_and_a_threelegged_shaivite_pg46sm.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 231px; FLOAT: right; HEIGHT: 182px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5457119483476990210" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7uVQdWCWQI/AAAAAAAAAM0/LND1XoH29LQ/s200/lord_vishnu_brahma_hanuman_and_a_threelegged_shaivite_pg46sm.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;लेकिन न तो वाल्मीकि के राम को और न ही तुलसी के राम को मैं मानवीय, महानायक या मर्यादा पुरूषोत्तम मानने को तैयार हूं। दोनों ही किताबें इतिहास कम, साहित्य ज्यादा हैं। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;कुछ मित्र कहते हैं कि राम का रूप मानवीय था और विष्णु के इस अवतार ने मानवीय रूप में काम किया, चमत्कारों का प्रदर्शन नहीं किया। मुझे तो ठीक इसके उल्टा दिखता है ... जरा वाल्मीकि रामायण या तुलसी का रामचरितमानस फिर से पढ़िए .. बचपन में राम कौशल्या को अपने मुंह में ब्रह्मांड का दर्शन कराते हैं ... अहिल्या को पैर से छूकर पत्थर से औरत बना देते हैं (जिसके चलते केवट पहले राम को पैर धोने को कहता है)... ये कहीं भी वर्णित नहीं है कि आखिर किस मानवीय शक्ति से राम ने सीता स्वयंवर में भगवान शिव का धनुष तोड़ने में सफलता पायी (इस धनुष को उस समय का सबसे शक्तिशाली आदमी रावण भी नहीं तोड़ पाया था) .. विज्ञान के तहत विकसित वो कौन सा बाण था कि मारीच को सिद्धाश्रम से दूर लंका के पास गिरा गया .. किस मानवीय शक्ति के तहत राम खर-दूषण की चौदह सहस्त्र सेना को अकेले ही खत्म कर देते हैं (लक्ष्मण ने इस युद्ध में भाग नहीं लिया था और इसके चलते ही सीता ने कर्तव्यच्युत होने का वो ताना दिया कि लक्ष्मण रेखा खींचने को विवश हो कर &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7uWKH2gR5I/AAAAAAAAAM8/nDEeogo2Dj4/s1600/Ram-Laxman-Shiva.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; FLOAT: left; HEIGHT: 163px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5457120474140002194" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7uWKH2gR5I/AAAAAAAAAM8/nDEeogo2Dj4/s200/Ram-Laxman-Shiva.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;सोनमृग की तलाश कर रहे राम की सहायता के लिए जाने को लक्ष्मण विवश हुए) ... वो भी दृश्य याद करें जब समुद्र पार करने का रास्ता तलाश पाने में विफल होने पर राम अपने रौद्र रूप में आ कर अपने बाण से समुद्र को सुखा डालने और वरूण का नामो-निशान मिटाने का ऐलान करते हैं और फिर पत्थर पर रामनाम लिखने से वो समुद्र में नहीं डूबता है ...। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;वाल्मीकि और तुलसी के राम तो हर कदम पर चमत्कार करते दिखते हैं और हम कहते हैं कि राम का रूप तो मानवीय था। वाह!!!&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7uXuPLL6-I/AAAAAAAAANE/HC82fOQzGu8/s1600/Vishnu.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 200px; FLOAT: right; HEIGHT: 205px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5457122194092714978" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7uXuPLL6-I/AAAAAAAAANE/HC82fOQzGu8/s200/Vishnu.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस देश के इतिहास के पुनर्पाठ की अतिसख्त आवश्यकता है .. वेदों से लेकर आज तक के इतिहास की। ऐसा क्यों है कि महामानव, भगवान के अवतार, दुनिया भर के महापुरूष केवल इसी देश में पैदा हुए और हमारे पास उनका एक भी ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है ? वेदों को हम दुनिया की सबसे पुरानी किताब कहते हैं और उन वेदों में से किसी का भी उपयोग हम अपनी किसी पूजा में, किसी मंदिर में नहीं करते हैं। गीता और रामायण को कहीं ज्यादा लोग जानते हैं और पूजते हैं। क्यों भई?&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://www.hindivishwa.org/writer_index_m.php"&gt;मुद्राराक्षस&lt;/a&gt; की एक किताब है - धर्मग्रंथों का पुनर्पाठ । इसे जरूर पढ़ना चाहिए, इतिहास की इस किताब की व्याख्या से आप पूरी तरह सहमत न हों ये मुमकिन है, लेकिन उनकी कई बातों को आप मानने के लिए तैयार होंगे। ... ऐसी कितनी कोशिशें इस देश में हुई हैं अपने इतिहास का मूल्यांकन करने के लिए?&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7ubPOWTQvI/AAAAAAAAANM/RkL_P408unE/s1600/L+K+Advani+3.JPG"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 148px; FLOAT: right; HEIGHT: 180px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5457126059341464306" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7ubPOWTQvI/AAAAAAAAANM/RkL_P408unE/s200/L+K+Advani+3.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;राम जन्मभूमि आंदोलन आजाद भारत के तीन-चार सबसे बड़े आंदोलनों में था, बाबरी मस्जिद गिरा भी, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पुरात्तत्ववेत्ताओं ने उस साइट की खुदाई भी की। कुछेक अवशेष जरूर मिले कि वहां मंदिर रहा होगा (हालांकि अभी भी ये संदिग्ध है), लेकिन ऐसे प्रमाण तो आज भी नहीं हैं जो बता सकें कि राम का जन्म उसी स्थान पर, उसी गर्भगृह में या उतनी ही दूरी पर कहीं हुआ।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7udDTY1uLI/AAAAAAAAANU/v19RL-KEcjM/s1600/Lord+Ram+as+child.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 237px; FLOAT: left; HEIGHT: 209px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5457128053559113906" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7udDTY1uLI/AAAAAAAAANU/v19RL-KEcjM/s200/Lord+Ram+as+child.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;राम तो राजकुमार थे, वाल्मीकि/तुलसी कहते हैं कि राम राजकुमार थे, अयोध्या के राजा दशरथ के बेटे थे और राजा लोग महलों में रहते थे। मतलब ये कि राम का जन्म तो महल में ही हुआ होगा (लव-कुश की तरह जंगल में नहीं)। तो फिर वो महल कहां गए ? अगर राम तीन-चार-पांच हजार साल पहले थे, तो उतने पुराने अवशेष आज की अयोध्या में तो होने ही चाहिए (आखिर आज की ही अयोध्या को हमने राम की भी अयोध्या माना है)। लेकिन आज तक ऐसा कोई भी पुरातात्विक अवशेष नहीं मिला। अयोध्या में जो भी मिला है वो पांच सौ से पंद्रह सौ साल पुराना है। मतलब ईसा के जन्म के बाद और हमारे धर्मग्रंथों की मानें तो राम तो ईसा से कई सौ या हजार साल पहले थे। मतलब क्या आज की अयोध्या सही है या हमारे धर्मग्रंथ किसी और अयोध्या की बात करते हैं। पहले इसे स्थापित कर लीजिए, ऐतिहासिक और पुरातात्विक सबूतों के आधार पर। फिर ये तय करिए कि बाबरी मस्जिद का वो विवादित ढ़ांचा जिसे हम राम का जन्मस्थान मानते हैं, वो सही है या गलत। &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7ud9icLVXI/AAAAAAAAANc/2y65P_kS2g4/s1600/Brahma-Vishnu-Mahesh+2.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 158px; FLOAT: right; HEIGHT: 200px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5457129054032057714" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7ud9icLVXI/AAAAAAAAANc/2y65P_kS2g4/s200/Brahma-Vishnu-Mahesh+2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;ब्रह्मा-विष्णु-महेश में आखिर महेश ही क्यों पहाड़ पर रहते हैं..विष्णु की तरह क्षीरसागर या ब्रह्मा के ब्रह्मलोक की तरह उनका कोई लोक क्यों नहीं है .. क्यों उन्हें स्वर्ग नसीब नहीं है .. शिव ही क्यों विष पीते हैं, ब्रह्मा-विष्णु क्यों नहीं (आखिर वो भी तो सृष्टि के तीन शीर्षस्थ पुरूषों में थे) .. ? &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;दरअसल ऐसी जानें कितनी बातें हमने जनश्रुति के आधार पर माना है और समय के साथ इनमें न जाने कितने बदलाव हुए। फिर हम आज क्यों इन्हें अक्षर सत्य मानना चाहते हैं?&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;ऐसे हजारों अनुत्तरित प्रश्न हैं .. इनकी चर्चा करना इस देश में मधुमक्खी के छत्ते पर ढेला मारने के समान है क्योंकि जहां इन्हें छेड़िये, बस लोग तैयार हो जाते हैं शब्दों के चाकू-तलवार-भाला-त्रिशूल लेकर। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;अद्भुत सवाल खड़े किए जाते हैं -- मसलन क्या आप ईसा या पैगंबर मुहम्मद के बारे में भी यही या ऐसी बात कर सकते हैं .. वगैरह-वगैरह। अब इस बात का कैसे मैं जबाव दूं .. मैं अगर ये कहूं कि इस देश की बहुसंख्यक आबादी में मैं पैदा हुआ हूं, लिहाजा उसके इतिहास पुरूषों, उसकी संसकृति को ज्यादा आसानी से मैं समझ सकता हूं बनिस्बत दूसरे धर्मों या संस्कृतियों के। लेकिन लोग उम्मीद करते हैं कि सतही जानकारी के आधार पर टिप्पणी की जाय और हम में से अधिकांश ऐसा ही करते हैं। हम वैसे लोग हैं जो दूसरे धर्म के लोगों को पड़ोसी बनाने को तो तैयार नहीं होते, लेकिन उनके जीवन और संस्कृति पर अपनी सतही जानकारी के जरिए एक्सपर्ट कमेंट करने को तैयार रहते हैं। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-2240304491817498019?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/2240304491817498019/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=2240304491817498019' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/2240304491817498019'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/2240304491817498019'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='राम के बहाने रामकथा और भारतीय इतिहास का पुनर्पाठ - कुछ प्रश्न'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/S7uS2vmuWlI/AAAAAAAAAMc/h45KG_H_tU8/s72-c/Ram-Laxman-Sita+in+jungle.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-5378821183745023043</id><published>2009-11-02T22:50:00.004+05:30</published><updated>2009-11-02T23:13:14.508+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपनी कविता'/><title type='text'>आभार</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;br /&gt;अरसे बाद नीचे की कुछ पंक्तियां रविवार की सुबह अनायास मुंह से निकले, मैंने उन्हें नोट कर लिया ... और इस तरह काफी दिनों के बाद कुछ लिखा / जीवन फिर सार्थक लगा&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन में&lt;br /&gt;क्या कभी हुआ है&lt;br /&gt;आपके साथ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...कि&lt;br /&gt;आप सो कर उठें&lt;br /&gt;और&lt;br /&gt;अजाने ही आभार&lt;br /&gt;व्यक्त करने लगें&lt;br /&gt;उन सबों का&lt;br /&gt;जिन्होंने जीवन के हर मोड़ पर&lt;br /&gt;आपका साथ दिया /&lt;br /&gt;आपको प्रेरित किया /&lt;br /&gt;जीवन के कठिनतम मोड़ पर भी&lt;br /&gt;आपके संग चले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...कि&lt;br /&gt;आप कृतज्ञ हो उठें&lt;br /&gt;अनायास&lt;br /&gt;उनके भी&lt;br /&gt;जिनसे आपने&lt;br /&gt;और जिन्होंने आपसे&lt;br /&gt;बनाए रखीं दूरियां&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...कि&lt;br /&gt;आप कृत-कृत्य हो उठें&lt;br /&gt;अपने होने में&lt;br /&gt;दूसरों के योगदान का&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...कि&lt;br /&gt;आपकी अधखुली आंखों में&lt;br /&gt;सुबह की रोशनी भरने से पहले&lt;br /&gt;अनजाने में ही&lt;br /&gt;शुक्रिया अदा करने के लिए&lt;br /&gt;जुड़ जाएं&lt;br /&gt;हाथ आपके&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(जैसे छठ मैय्या को अर्घ्य देते हुए&lt;br /&gt;जुड़ जाते हैं मां के हाथ)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज सुबह मेरे साथ&lt;br /&gt;कुछ ऐसा ही हुआ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोपहर का ये चमकता सूर्य /&lt;br /&gt;शाम का छाता धुंधलका /&lt;br /&gt;रात में शहर की इन&lt;br /&gt;चमचमाती रोशनियों के बाद भी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह की गोधूलि वेला&lt;br /&gt;की वो अनुभूति&lt;br /&gt;अब भी बरकरार है /&lt;br /&gt;आज जितना हल्का मन&lt;br /&gt;पहले शायद कभी नहीं था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden"&gt;&lt;!--Session data--&gt;&lt;input onclick="jsCall();" id="jsProxy" type="hidden"&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden"&gt;&lt;!--Session data--&gt;&lt;input onclick="jsCall();" id="jsProxy" type="hidden"&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden"&gt;&lt;!--Session data--&gt;&lt;input onclick="jsCall();" id="jsProxy" type="hidden"&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-5378821183745023043?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/5378821183745023043/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=5378821183745023043' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/5378821183745023043'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/5378821183745023043'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='आभार'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-2814457207835990023</id><published>2009-04-12T20:24:00.009+05:30</published><updated>2009-04-13T02:28:23.493+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आईए चुनाव-चुनाव खेलते हैं..'/><title type='text'>किसकी होगी अगली सरकार उर्फ आईए चुनाव-चुनाव खेलते हैं..</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/SeJJhmHUU1I/AAAAAAAAAHc/hg_9wXJREio/s1600-h/politics+collage+1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5323898551021097810" style="WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 217px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/SeJJhmHUU1I/AAAAAAAAAHc/hg_9wXJREio/s400/politics+collage+1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/SeJI_zkzjrI/AAAAAAAAAHU/2vNacDelZJU/s1600-h/politics+collage+1.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;div&gt;&lt;h3 style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="FONT-WEIGHT: normal; COLOR: rgb(0,102,153)font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;शायद इस सवाल का जबाव हम सब (एक अरब से ज्यादा भारतीय) जानना चाहते हैं .. कौन बनाएगा सरकार .. किसके हाथ आएगी दिल्ली की गद्दी ? इस का उत्तर जानने की जल्दी हमारे नेताओं के अलावा शायद हमारे मीडिया (प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों को) है। काश ! कि कोई अलादीन का चिराग होता, हम रगड़ते .. एक जिन्न निकलता .. हम पूछते और वो कहता अभी लो मेरे आका .. फिर हमारे सामने होते 2009 के आम चुनावों के नतीजे और सरकार के मुखिया का नाम । &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;h3 style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="FONT-WEIGHT: normal; COLOR: rgb(0,102,153)font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;तो इस सवाल का जबाव जानने की कोशिश सभी कर रहे हैं और जाहिर तौर पर मैं भी उनसे अलग नहीं हूं। अपनी राजनीतिक समझ के अनुसार मैंने भी चुनावी नतीजों का एक अनुमानित परिदृश्य तय किया है .. चाहे तो इसे आप मेरी भविष्यवाणियां भी कह सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;h3 style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="FONT-WEIGHT: normal; COLOR: rgb(0,102,153)font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;खैर पहले मेरे अनुमान और फिर अपना विश्लेषण आपके सामने रखूंगा : &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;u&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;चुनावी नतीजे - &lt;/span&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;2009&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;table class="MsoNormalTable" style="BORDER-RIGHT: medium none; BORDER-TOP: medium none; BORDER-LEFT: medium none; BORDER-BOTTOM: medium none; BORDER-COLLAPSE: collapse" cellspacing="0" cellpadding="0" border="1"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: windowtext 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: windowtext 1pt solid; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: windowtext 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: windowtext 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;u&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;राजनीतिक दल&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: windowtext 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: windowtext 1pt solid; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: windowtext 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;u&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;अनुमानित सीटें&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="text-align: auto;line-height: 15.6pt; " align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://bjp.org/"&gt;भाजपा&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;130-135&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;span class="apple-style-span"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.aicc.org.in/new/"&gt;कांग्रेस&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;a href="http://aicc.org.in/"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;120-130 &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Bahujan_Samaj_Party"&gt;बसपा&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;40-44&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://cpim.org/"&gt;माकपा&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;28-31&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.aiadmkallindia.org/"&gt;अन्नाद्रमुक&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;20-22&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.telugudesam.org/tdpcms/"&gt;तेलुगूदेशम&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;16-18&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Janata_Dal_(United)"&gt;जनता दल (यूनाइटेड)&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt; &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;16-18&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Samajwadi_Party"&gt;समाजवादी पार्टी&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;16-17&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span lang="HI"  style="TEXT-DECORATION: none;font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.ncp.org.in/"&gt;राष्ट्र्वादी&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.ncp.org.in/"&gt; कांग्रेस पार्टी &lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;14-15&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span lang="HI"  style="TEXT-DECORATION: none;font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.shivsena.org/"&gt;शिव&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.shivsena.org/"&gt; सेना&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;13-14&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span lang="HI"  style="TEXT-DECORATION: none;font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Biju_Janata_Dal"&gt;बीजू&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Biju_Janata_Dal"&gt; जनता दल&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;11-12&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.rashtriyajanatadal.com/"&gt;राष्ट्रीय जनता दल&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;08-09 &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span lang="HI"  style="TEXT-DECORATION: none;font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://trsparty.in/"&gt;तेलंगाना&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://trsparty.in/"&gt; राष्ट्र समिति&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;06-08&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span lang="HI"  style="TEXT-DECORATION: none;font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shiromani_Akali_Dal"&gt;शिरोमणि&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shiromani_Akali_Dal"&gt; अकाली दल&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;05-06&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span lang="HI"  style="TEXT-DECORATION: none;font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.agpassam.org/default1.html"&gt;असम&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.agpassam.org/default1.html"&gt; गण परिषद&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;05-06&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="line-height: 15.6pt; text-align: center; " align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.praja-rajyam.com/"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://www.praja-rajyam.com/"&gt;प्र&lt;/a&gt;जा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.praja-rajyam.com/"&gt; राज्यम्&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;06-09&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.cpindia.org/"&gt;भाकपा&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;05&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.dmk.in/"&gt;द्रमुक&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;04-05&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Pattali_Makkal_Katchi"&gt;पीएमके&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;04-05&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://mdmk.org.in/"&gt;एमडीएमके&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;03-04&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.lokjanshaktiparty.com/"&gt;लोक&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.lokjanshaktiparty.com/"&gt; जनशक्ति पार्टी&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;03-04&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jharkhand_Mukti_Morcha"&gt;झारखंड मुक्ति मोर्चा&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;03-04&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Indian_National_Lok_Dal"&gt;इंडियन&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Indian_National_Lok_Dal"&gt; नेशनल लोक दल&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;03-04&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span lang="HI"  style="TEXT-DECORATION: none;font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.trinamoolcongress.com/"&gt;तृणमूल&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.trinamoolcongress.com/"&gt; कांग्रेस&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;05-07&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Janata_Dal_(Secular)"&gt;जनता&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Janata_Dal_(Secular)"&gt; दल (सेक्यूलर)&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;02-03&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.forwardbloc.org/"&gt;ऑल&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://www.forwardbloc.org/"&gt; इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;03&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Revolutionary_Socialist_Party_(India)"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-weight: bold;"&gt;आरएसपी&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;03&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jammu_&amp;amp;_Kashmir_National_Conference"&gt;नेशनल कॉन्फ्रेंस &lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;03&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Rashtriya_Lok_Dal"&gt;राष्ट्रीय&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Rashtriya_Lok_Dal"&gt; लोक दल&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;03-04&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: 1pt solid; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jammu_and_Kashmir_People's_Democratic_Party"&gt;पीडीपी&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: 1pt solid; PADDING-RIGHT: 5.4pt; BORDER-TOP: medium none; PADDING-LEFT: 5.4pt; PADDING-BOTTOM: 0in; BORDER-LEFT: medium none; WIDTH: 221.4pt; PADDING-TOP: 0in; BORDER-BOTTOM: 1pt solid" valign="top" width="295"&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt; TEXT-ALIGN: center" align="center"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;01&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;ये एक विस्तृत विश्लेषण के आधार पर है। संक्षेप में ये कि इनका आधार राज्यवार है और मुझे लगता है कि राज्यों के अपने मुद्दे इस बार के चुनावों में भी सबसे बड़ी भूमिका निभाएंगे। मतलब ये कि जल-जोरू-जमीन या बिजली-सड़क-पानी .. जैसे भी आप समझना चाहें, समझ लें। आतंकवाद .. मंदी जैसे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों का असर तो होगा लेकिन बहुत-थोड़ा। मतलब ये इन्द्रधनुषी नतीजे बहुत मजेदार गुल खिला सकते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color: rgb(0, 102, 153); font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;भाजपा या कांग्रेस में से किसी को भी 135 से ज्यादा सीटें नहीं मिलने वाली हैं और इसका मतलब ये कि 16 मई से अगले पंद्रह दिनों तक कई तरह के राजनीतिक परिवर्तन होंगे। एक-दूसरे को गाली देने वाली पार्टियां गलबहियां डाले घूमेंगी और गलबहियां डाले घूम रही पार्टियां अखाड़े में एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोकतीं नजर आ सकती हैं।&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color: rgb(0, 0, 0);  font-family:Georgia;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color: rgb(0, 102, 153); font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color: rgb(0, 0, 0);  font-family:Georgia;"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;मतलब ये कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार या पीएम इन वेटिंग (ये अच्छा व्यंग्य भाजपा ने अपने सर्वकालिक महान नेता के साथ किया है) &lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.lkadvani.in/"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;लालकृष्ण आडवाणी&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; का सपना सपना ही बना रह सकता है। प्रधानमंत्री की कुर्सी के साथ आडवाणीजी की धूप-छांह बरकरार ही रहने वाली है। &lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.mypopkorn.com/blogs/lalu-prasad-yadav/"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;लालूजी&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; के शब्दों में कहें तो &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;‘&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;आडवाणीजी राज कैसे करिहें, जब उनके हाथ में राजयोग ही नहीं है&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;’ &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color: rgb(0, 102, 153); font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color: rgb(0, 0, 0);  font-family:Georgia;"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;मेरा तो ये भी मानना है कि इन इन्द्रधनुषी नतीजों का अनुमान कांग्रेस ने भी लगा लिया है। और शायद इसी वजह से &lt;/span&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Rahul_Gandhi"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;युवराज राहुल गांधी&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; की ताजपोशी का ऐलान इस बार के चुनावों में नहीं किया गया। मतलब ये भी कि बिहार और उत्तर प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला और इन-इन राज्यों में खोई जमीन फिर पाने के लिए संघर्ष का रास्ता इसीलिए अख्तियार किया गया।&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 238); "&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color: rgb(0, 0, 238); font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color: rgb(0, 0, 0);  font-family:Georgia;"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 238); "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;अब चाहे इसे कांग्रेस पार्टी ने भांपा हो या फिर उसके युवराज ने, लेकिन मुझे लगता है कि इस बार के चुनावों से ही कांग्रेस ने अगले चुनावों (2011 या उसके बाद कभी भी) की तैयारी भी शुरू कर दी है। इस बार के अनुमानित खिचड़ी नतीजों के चलते ऐसा लगता है कि कांग्रेस के रणनीतिज्ञ ये मानते हैं कि इस बार की सरकार 2 साल से ज्यादा नहीं चलने वाली। ऐसे में अगर युवराज की ताजपोशी करनी है तो जमीन अभी से तैयार करनी होगी।&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 102, 153); "&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color: rgb(0, 102, 153); font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color: rgb(0, 0, 0);  font-family:Georgia;"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 238); "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 102, 153); "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;तो इस बार के अनुमानित खिचड़ी बहुमत के चलते 1996 की &lt;/span&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/H._D._Devegowda"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;देवेगौड़ा&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; सरकार जैसा प्रयोग दुहराया जाने वाला है। इस बार भी कोई ऐसा नाम सामने आ सकता है जिसकी हम उम्मीद नहीं कर रहे। और ये नाम किसी का भी हो सकता है .. &lt;/span&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sharad_Pawar"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;शरद पवार&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mayawati"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;मायावती&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Naveen_Patnaik"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;नवीन पटनायक&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Nitish_Kumar"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;नीतिश कुमार&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; या कोई और ..। नाम का अनुमान लगाना तो लगभग असंभव है और शायद भारतीय राजनीति की यही खूबी है। 16 मई के बाद क्या होगा, इसके लिए अभी से खून क्यों जलाएं .. वो भी तब जब एक भी वोट नहीं डाले गए हों।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: normal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;हां, कुछ अनुमान जरूर लगाए जा सकते हैं। मसलन ऐसी खिचड़ी नतीजों के बाद, भाजपा विरोध के नाम पर सभी गैर कांग्रेस पार्टियां एक जुट हो सकती हैं या भाजपा को समर्थन देने से इनकार कर सकती हैं। ऐसे में, शायद भाजपा का सरकार बनाने का सपना अधूरा ही रह जाय। या फिर भाजपा छोटी पार्टियों की सरकार को बाहर से समर्थन दे। या फिर 1996 में बनी बसपा-भाजपा की उत्तर प्रदेश का प्रयोग दुहराया जाय .. मतलब ये कि एक साल के लिए प्रधानमंत्री तुम्हारा हो, फिर एक साल के लिए प्रधानमंत्री हमारा हो टाइप।&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: normal; "&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color: rgb(0, 102, 153);  line-height: normal;font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: normal; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;हालांकि मुझे सबसे ज्यादा संभावना इस बात की लगती है कि जो सरकार बनेगी उसमें कांग्रेस और वामपंथी दल, दोनों बड़ी भूमिका निभाएंगे। भूमिका ही नहीं निभाएंगे बल्कि दोनों साथ भी आएंगे और सरकार में अपने लिए बड़े रोल के लिए सौदेबाजी भी करेंगे। मतलब ये कि भानुमति का कुनबा यानी तीसरा मोर्चा (कांग्रेस, भाजपा के अलावा बाकी के दल) कांग्रेस से सौदेबाजी करेगा। ऐसा हो सकता है कि तीसरा मोर्चा कांग्रेस से कहे कि &lt;/span&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/United_Progressive_Alliance"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;यूपीए सरकार&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; में हमने &lt;/span&gt;&lt;a href="http://pmindia.nic.in/"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;आपका प्रधानमंत्री&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; देख लिया, अब हमारी बारी है। कांग्रेस से ये कहा जा सकता है कि हमारे प्रधानमंत्री को आप समर्थन दें और हमारी सरकार में आप भी शामिल हों जाय .. या चाहें तो बाहर से ही समर्थन दें पर प्रधानमंत्री हमारा ही होगा। सबसे ज्यादा संभावना इस बात की है कि कांग्रेस सरकार में शामिल होगी और कुछ बड़े मंत्रालयों के लिए सौदेबाजी करेगी (गठबंधन के सबसे बड़े दल के नाते)। &lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 238); line-height: 20px; "&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color: rgb(0, 0, 238); font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: normal; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 238); line-height: 20px; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;इतना ही नहीं, वामपंथी दल भी &lt;/span&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jyoti_Basu"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;1996 की ऐतिहासिक भूल&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; नहीं दुहराएंगे और सरकार में शामिल हो जाएंगे। जाहिर तौर पर इनमें मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लोग भी होंगे। ऐसा मुमकिन होगा .. माकपा महासचिव &lt;/span&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Prakash_Karat"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;प्रकाश करात&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; साहब के धुरजोर विरोध के बावजूद ऐसा होगा। मेरा अनुमान ये है कि केरल में वामपंथियों को करारी शिकस्त मिलने वाली है और उनकी ज्यादातर सीटें पश्चिम बंगाल से ही आने वाली हैं। ऐसे में माकपा की बंगाल लॉबी करात के विरोध पर भारी पड़ सकती है। ये भी हो सकता है कि &lt;/span&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Buddhadeb_Bhattacharya"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;बुद्धदेव भट्टाचार्य&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; को प्रधानमंत्री बनाने के नाम पर आम सहमति बन जाय और दो अलग-अलग ध्रुवों पर खड़े कांग्रेस और वामदल साथ-साथ आ जाएं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: normal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;मुझे तो ये भी लगता है कि प्रधानमंत्री बनने की हर संभव कोशिशों के बावजूद मायावती की दूरी इस गद्दी से अभी बरकरार रहेगी। 40-44 सीटों के बावजूद ऐसा हो सकता है क्योंकि मायावती ब्रांड की राजनीति को इतनी जल्दी अगर प्रधानमंत्रित्व दे दिया गया तो कई दलों की दुकानदारी बंद हो सकती है या ज्यादा सभ्य शब्दों में कहें तो उनके अस्तित्व पर संकट आ सकता है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: normal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;शरद पवार जैसे नेताओं के लिए तो ये चुनाव जीवन-मरण की तरह हैं और अभी नहीं तो कभी नहीं वाली बात है। उम्र उनके खिलाफ है और शायद ये उनके लिए आखिरी मौका है। तो इस देश की सबसे बड़ी गद्दी पाने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं (या फिर हार मान लें और जितना मिल रहा है, उतने पर ही संतोष कर लें)। हालांकि इनके नाम पर आमसहमति बनने के आसार कम ही दिखते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color: rgb(0, 102, 153); font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;लालूजी-&lt;/span&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Ram_Vilas_Paswan"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;पासवानजी&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; जैसे नेता अपनी-अपनी करते रहेंगे और केंद्र में बनने वाली सरकार में मंत्री बने रहेंगे। हां, उनकी सौदेबाजी की ताकत यूपीए सरकार के दिनों वाली नहीं रहेगी।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: normal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;तो &lt;/span&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mulayam_Singh_Yadav"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;मुलायम सिंह यादव&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; कहां होंगे&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,102,153)"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;? &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;ये लाख टके का सवाल है क्योंकि नई सरकार में मायावती की बड़ी भूमिका हो सकती है। ऐसे में मुलायम का रोल केंद्र में बनने वाली सरकार में क्या होगा, ये कहना बहुत मुश्किल है। लेकिन ये भी बात है कि &lt;/span&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/United_Front_(India)"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;संयुक्त मोर्चा सरकार&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; के बाद से मुलायम केंद्र की सरकार से बाहर हैं .. और इस बार तो उत्तर प्रदेश से भी बाहर हैं। ऐसे में केंद्र में एक सार्थक भूमिका की तलाश मुलायम को है और इसीलिए उनकी भूमिका का अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है। &lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;नीतिश जैसे नेता तो शायद अभी अपनी बारी आने का इंतजार करेंगे और इतनी जल्दी अपने पत्ते खोलने से परहेज करेंगे। मुझे काफी समय से ये लगता रहा है कि नीतिश बिना धीरज खोये लंबे संघर्ष की तैयारी कर रहे होते हैं, वो भी बिना किसी शोर-गुल के। तो प्रधानमंत्रित्व के लिए अपना दावा भी वो समय आने पर ही करेंगे .. शायद 2011 या उसके बाद होने वाले चुनावों के दौरान।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color: rgb(0, 102, 153); font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;मुझे तो नवीन पटनायक भी लंबी रेस के घोड़े लगते हैं। भाजपा का दामन छोड़ने के बावजूद भी वो अपने पत्ते इतनी जल्दी नहीं खोलेंगे और उचित समय का इंतजार करेंगे। तब तक के लिए केंद्र में कुछ मंत्रालयों की गद्दी से उन्हें ऐतराज नहीं दिखता।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color: rgb(0, 102, 153); font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;लेकिन जैसा मैं लगातार कह रहा हूं कि ये सब राजनीतिक गणित है और इनका अनुमान लगाना, बेवजह अपना खून जलाने जैसा है। तो हम सबों को 16 मई और उसके बाद पंद्रह दिनों तक चलने वाले तमाशे का इंतजार करना चाहिए। उस समय के राजनीतिक दोस्त-दुश्मन-समीकरण बड़े चौंकाने वाले हो सकते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color: rgb(0, 102, 153); font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;एक आखिरी बात और .. मैं ना तो राजनीतिज्ञ हूं, ना ही कोई चुनाव विश्लेषक और मेरे अनुमान सौ फीसदी गलत भी हो सकते हैं। शायद मुझे इस बात से ज्यादा खुशी होगी, अगर कोई ऐसी सरकार बने जो पांच साल चले (मतलब ये कि उसके केंद्र में भाजपा या कांग्रेस हो)। मंदी के इस दौर में देश में राजनीतिक स्थिरता की जरूरत है, ताकि प्रगति के पथ पर उठे हमारे कदम आगे बढ़ते रहें।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color: rgb(0, 102, 153); font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="LINE-HEIGHT: 15.6pt"&gt;&lt;span lang="HI"  style="COLOR: rgb(0,102,153);font-family:Mangal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;लेकिन आम भारतीय जनमानस को हल्के में हमें नहीं लेना चाहिए। जो भी दल ऐसा करता है, करेगा .. उसका &lt;/span&gt;&lt;em&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;'भारत अस्त'&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; हो जाएगा। आखिरकार इसी जनता ने &lt;/span&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Indira_Gandhi"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;इंदिरा गांधी&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; जैसी सर्वशक्तिमान और शायद आजाद भारत की अब तक की सबसे ताकतवर नेता को भी धूल चटा दी थी। इसलिए जय उसकी होगी/होनी चाहिए जो जनता के बीच जाएगा .. जनता के लिए काम करता दिखेगा .. जल-जोरू-जमीन के लिए संघर्ष करेगा, चाहे उसका राजनीतिक आधार या पार्टी जो भी हो। तो 16 मई तक इंतजार कीजिए, एक सरप्राइज पैकेज आने वाला है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-2814457207835990023?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/2814457207835990023/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=2814457207835990023' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/2814457207835990023'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/2814457207835990023'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2009/04/blog-post_12.html' title='किसकी होगी अगली सरकार उर्फ आईए चुनाव-चुनाव खेलते हैं..'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/SeJJhmHUU1I/AAAAAAAAAHc/hg_9wXJREio/s72-c/politics+collage+1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-6666499253235033197</id><published>2009-04-04T00:25:00.011+05:30</published><updated>2009-04-04T02:05:13.244+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वित्त मंत्री'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चुनाव'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सीताराम येचुरी'/><title type='text'>सीताराम येचुरी .. हमारे नए वित्त मंत्री ?</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/SdZxIPjeMbI/AAAAAAAAAEU/HIPsYCtEeIc/s1600-h/Yechuri.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5320564396213023154" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 123px; CURSOR: hand; HEIGHT: 148px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/SdZxIPjeMbI/AAAAAAAAAEU/HIPsYCtEeIc/s200/Yechuri.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/SdZp9gWSt6I/AAAAAAAAAEM/D8_G4wTquEU/s1600-h/Hammer.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5320556515161192354" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 88px; CURSOR: hand; HEIGHT: 73px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/SdZp9gWSt6I/AAAAAAAAAEM/D8_G4wTquEU/s200/Hammer.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; मैं मजाक नहीं कर रहा हूं .. चुनावी गतिविधियों को देखने के बाद मुझे तो ऐसा ही लगता है कि &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sitaram_Yechury"&gt;सीताराम येचुरी&lt;/a&gt; हमारे नए &lt;a href="http://finmin.nic.in/"&gt;वित्त मंत्री &lt;/a&gt;बन सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;क्यों ? इसलिए क्योंकि हमने मुख्यधारा की लगभग सभी पार्टियों को सरकार में देख लिया है, प्रधानमंत्री या दूसरे मंत्रियों के रूप में देख लिया है। एक बस &lt;a href="http://www.cpim.org/"&gt;वाम दल &lt;/a&gt;ही केंद्रीय सरकार में नहीं आए (1996 की संयुक्त मोर्चा सरकार को छोड़ कर, जिसमें &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Indrajit_Gupta"&gt;कॉमरेड इंद्रजीत गु्प्त &lt;/a&gt;और &lt;a href="http://parliamentofindia.nic.in/ls/lok11/biodata/11bi34.htm"&gt;चतुरानन मिश्र &lt;/a&gt;मंत्री बने थे थोड़े समय के लिए)। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इसलिए भी कि येचुरी साहब के बड़े जबरदस्त ख्यालात हैं .. अर्थव्यवस्था के बारे में, मंदी से निपटने के बारे में .. ।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;जरा उनके चुनावी घोषणापत्र पर नजर डालिए .. &lt;a href="http://cpim.org/"&gt;मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी &lt;/a&gt;अपने &lt;a href="http://cpim.org/manifesto.pdf"&gt;घोषणापत्र &lt;/a&gt;के पृष्ठ 10 पर कहती है कि अगर भारतीय वित्तीय संस्थान मंदी के इस दौर में भी सुरक्षित बचे हैं तो इसका श्रेय उन्हें जाता है। उन्हें इसलिए क्योंकि उन्होंने वर्तमान &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/United_Progressive_Alliance"&gt;यूपीए सरकार &lt;/a&gt;को वित्तीय संस्थानों में फेरबदल करने से रोका, उन्हें स्वायत्तता देने, उन्हें निजीकरण से बचाया .. वगैरह..वगैरह..।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/SdZpJeayCRI/AAAAAAAAAEE/vsQbDkSyWh4/s1600-h/Hammer.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;माकपा के घोषणापत्र का सबसे मजेदार हिस्सा है घरेलू वित्तीय संस्थानों पर नकेल कसने के संबंध में (पृष्ट 15/माकपा घोषणापत्र)। इसके बारे में मेरे एक मित्र का कहना है कि अगर इन सुझावों को मान लिया जाय तो 1991 से चल रही नई आर्थिक नीति को हम सिर के बल खड़ा कर देंगे।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;माकपा के घोषणापत्र का एक और मजेदार हिस्सा है जहां वो घरेलू धनकुबेरों पर नए टैक्स लगाने की बात करते हैं। इस संबंध में मैंने कुछ दिनों पहले येचुरी साहब को एक टीवी चैनल पर अपना पक्ष बयान करते सुना .. क्या ईमानदारी थी और कितने प्रतिबद्ध वो लग रहे थे ..। ईमानदारी से कहूं तो इस कार्यक्रम को देखने के दौरान ही ये बात मेरे दिमाग में कौंधी कि येचुरी साहब हमारे नए वित्त मंत्री बन सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;ये भी सवाल मन में गूंजा कि भारत कैसा लगेगा जब भारत के वित्त मंत्री सीताराम येचुरी जैसे एक वामपंथी नेता होंगे? जरा इस सवाल के जबाव को टटोल कर देखिए ..।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऐसे क्यों सीताराम येचुरी हमारे नए वित्त मंत्री बन सकते हैं .. इसके पक्ष में मेरे पास एक और कारण है ..।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;चुनावों में दिलचस्पी मेरी भी है और चुनावी विश्लेषकों की इस भीड़ से मैं भी अलग नहीं हूं। मैंने भी चुनावों के नतीजे का एक खाका तय किया है, मेरी अपनी भविष्यवाणियां हैं और उनके आधार पर मैं ये कहना चाहता हूं कि हमारे अगले प्रधानमंत्री &lt;a href="http://www.bjp.org/"&gt;भाजपा &lt;/a&gt;या &lt;a href="http://www.aicc.org.in/"&gt;कांग्रेस &lt;/a&gt;से नहीं होंगे .. वे किसी तीसरे ही दल के नेता/नेत्री होंगे और आने वाली सरकार भी एक खिचड़ी सरकार होगी, गठबंधन सरकार होगी। ये हो सकता है कि इस सरकार को भाजपा बाहर से समर्थन दे या फिर कांग्रेस समर्थन भी दे और सरकार का हिस्सा भी बन जाए। लेकिन इन दोनों पार्टियों की सरकार तो नहीं ही बनने जा रही है। हालांकि इन भविष्यवाणियों के बारे में विस्तार से मैं अगली बार लिखूंगा .. उस बार मैं अपना राज्यवार आंकड़ा दूंगा और नतीजे आने तक इन पर कुछ-न-कुछ लिखता रहूंगा।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;खैर, तो विषय पर लौटते हुए .. मेरा मानना है कि अगले सरकार के गठन में भी वाम दलों की बड़ी भूमिका होगी। यहां मैं एक और भविष्यवाणी करना चाहता हूं कि इस बार बनने वाली सरकार में वामदल भी शामिल होंगे, माकपा सहित। जी हां, इस बार वे &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jyoti_Basu"&gt;1996 की ऐतिहासिक भूल &lt;/a&gt;को नहीं दुहराएंगे, जब ज्योति बसु को तीसरे मोर्च ने अपना नेता चुना था, ज्योति दा प्रधानमंत्री बनना भी चाहते थे लेकिन पार्टी (माकपा) ने इसकी मंजूरी नहीं दी थी।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;मुझे तो साफ लगता है कि माकपा सहित बाकी वामपंथी पार्टियां इस गलती को फिर से नहीं दुहराएंगी, चाहे जो भी हो जाए। और &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Prakash_Karat"&gt;प्रकाश करात साहब&lt;/a&gt; के धुरजोर विरोध के बावजूद ऐसा होगा, ये भी मैं मानता हूं। ऐसा मैं ही नहीं, कई वाम नेता भी मानते हैं। इन नेताओं का ये भी मानना है कि यूपीए सरकार में शामिल नहीं होने का फैसला भी एक ऐतिहासिक भूल थी। मेरी जानकारी के मुताबिक इस मसले पर माकपा सहित सभी वाम दलों में खासा मतभेद है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;इसलिए अगली सरकार के गठन में हर पार्टी, हर दल अपने लिए सोने की लंका तलाशेगी और जाहिर तौर पर वाम दल भी इसके अपवाद नहीं होंगे। मेरी जानकारी के मुताबिक नई सरकार में शामिल होने के लिए वे &lt;a href="http://finmin.nic.in/"&gt;वित्त मंत्रालय&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://shipping.gov.in/"&gt;शिपिंग&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://indianrailways.gov.in/"&gt;रेलवे&lt;/a&gt; और &lt;a href="http://rural.nic.in/"&gt;ग्रामीण विकास &lt;/a&gt;जैसे मंत्रालयों की मांग कर सकते हैं। आपकी जानकारी के लिए कि ये वे मंत्रालय जिन्होंने पिछले पांच सालों में माकपा के &lt;a href="http://wb.nic.in/"&gt;पश्चिम बंगाल &lt;/a&gt;सरकार के लिए सबसे ज्यादा अड़चनें पैदा की।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;यहां मैं एक बात और स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैं कभी भी वामदलों का समर्थक नहीं रहा हूं। हां, वाममार्गी जरूर हूं लेकिन विद्यार्थी जीवन में मैंने हमेशा वाम दलों की राजनीति का विरोध ही किया है और आज भी उनकी राजनीति का विरोधी हूं। इतना जरूर है कि वामपंथ की कई बातें मुझे लगती हैं कि जीवन में उतारने की जरूरत है या उनके लागू किए जाने से आम आदमी का खासा भला हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तो खैर, विषय पर लौटते हुए .. मुझे लगता है कि पं. बंगाल में वाम दलों को अच्छी-खासी सीटें इस बार भी मिल जाएंगी (पिछली बार से थोड़ी कम) लेकिन &lt;a href="http://kerala.gov.in/"&gt;केरल &lt;/a&gt;में उनका सफाया हो सकता है। मेरे ख्याल से &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mamata_Banerjee"&gt;ममता बैनर्जी&lt;/a&gt; को इन चुनावों में ठीक-ठाक तवज्जो मिल जाएगी और &lt;a href="http://www.trinamoolcongress.com/"&gt;तृणमूल&lt;/a&gt;-कांग्रेस गठबंधन को इस बार पं. बंगाल में 12-13 सीटें मिल सकती हैं। ये बहुत आशावादी दृष्टिकोण है मेरा मतलब ये कि इससे ज्यादा तो नहीं ही मिलेगी। इस मामले में अंग्रेजी के बड़े अखबारों या न्यूज चैनलों से मैं भिन्न दृष्टिकोण रखता हूं। मेरा मतलब ये है कि अंग्रेजी के अखबार बार-बार पं. बंगाल में बदले हुए मौसम की बात कर रहे हैं लेकिन ये वोट में परिवर्तित हो पाएगा, इस पर मुझे शंका है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;मेरी स्पष्ट राय है कि लाख प्रयत्नों के बावजूद ममता दी वाम दलों के बंगाल किले को बहुत हिला नहीं पाएंगी और अकेले माकपा को 20 से ज्यादा सीटें इन चुनावों में बंगाल से मिल सकती हैं।&lt;br /&gt;इन नतीजों के चलते नई सरकार के गठन के दौरान पं. बंगाल अपना हिस्सा मांगेगा और प्रकाश करात अगर अपनी जिद पर अड़े रहे तो महासचिव होने के बावजूद वो पार्टी में अकेले पड़ सकते हैं। मतलब ये कि सरकार के गठन में माकपा के रोल का बड़ा हिस्सा पं. बंगाल के मार्क्सवादी तय करेंगे और केरल में चूंकि उनका सफाया हो चुका होगा, इसलिए केरल लॉबी के समर्थन के बावजूद करात साहब की ज्यादा चलेगी नहीं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऐसे में मुझे लगता है कि माकपा की ओर से मंत्री बनने के लिए जो दो सबसे योग्य उम्मीदवार हैं - उनमें सीताराम येचुरी वित्त मंत्री के रूप में और &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Md._Salim"&gt;मो. सलीम&lt;/a&gt; किसी और मंत्रालय में। चार से ज्यादा माकपा को कोटा नहीं मिलने वाला। लिहाजा बाकी दो नामों पर आप भी जूझिए/भविष्यवाणी कीजिए और मैं भी अपनी किस्मत कुछ दिनों बाद आजमाऊंगा। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-6666499253235033197?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/6666499253235033197/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=6666499253235033197' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/6666499253235033197'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/6666499253235033197'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='सीताराम येचुरी .. हमारे नए वित्त मंत्री ?'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_NYHt_h3fUpo/SdZxIPjeMbI/AAAAAAAAAEU/HIPsYCtEeIc/s72-c/Yechuri.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-1920830158936275450</id><published>2008-12-03T02:28:00.002+05:30</published><updated>2008-12-03T03:04:10.360+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मुंबई पर हमला'/><title type='text'>मुंबई पर आतंकवादी हमला</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;em&gt;ये मेरी प्रतिक्रिया का पहला हिस्सा है&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;u&gt;मेरे कुछ मित्रों की प्रतिक्रिया - &lt;/u&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;मित्र 1&lt;/strong&gt; (गुस्से से भरा हुआ है बिल्कुल एंग्री यंग मैन की तरह.. कि प्रधानमंत्री या कोई&lt;br /&gt;और नेता मिले तो कच्चा चबा जाए, टाइप से। उसके मुताबिक प्रधानमंत्री राष्ट्र को इस संकट&lt;br /&gt;की घड़ी में कैसे संबोधित करेंगे) --&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रधानमंत्री (दूरदर्शन पर बोलते हुए): प्यारे देशवासियों, इस संकट की घड़ी में आप अपनी, अपने बीवी-बच्चों-परिवारजनों और सामान की सुरक्षा स्वयं कर लें (जैसे कि रेलवे की एनाउंसर कहती है - यात्रीगण, कृप्या अपनी और अपने सामान की सुरक्षा खुद करें)। हमारे जैसे VVIPs के लिए NSG और SPG है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मित्र 2 : &lt;/strong&gt; इस हमले से 3 लोग बड़े खुश हुए होंगे - एक तो वे जिन्होंने ये हमला करवाया, दूसरे भाजपा वाले कि आतंक के सहारे 6 राज्यों में हो रहे चुनावों में उनकी नैया पार लग जाएगी और तीसरे टीवी मीडिया वाले कि चलो अब अगले कई दिनों का मसाला मिला॥ न्यूज़ का न्यूज़ और सनसनी अलग से। इसे भावना की चाशनी में मिला कर जब तक चाहो परोसते रहो। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मित्र 3 &lt;/strong&gt;(27 नवंबर की रात को टीवी देखते हुए) - मुंबई का ELITE CLASS इन हमलों से क्यों दुखी है/क्यों गु्स्से में है? ॥ दरअसल जब-जब शहर में बाढ़ आई तो इन्होंने 5-स्टार होटलों का रूख किया ; जब-जब बिजली गुल हुई तो ये 5-स्टार होटलों की ओर भागे ; जब शहर में दंगे हुए तो इन्हें 5-स्टार होटलों ने बचाया। अबकी तो 5-स्टार होटलों पर ही हमला हो गया तो इन्हें कौन बचाएगा। अब तो इन्हें विदेश में ही बसना पड़ेगा, पर वहां इन्हें पूछेगा कौन? &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;मैं अपने तीसरे मित्र की बात से पूरी तरह इत्तेफाक नहीं रखता हूं फिर भी मुझे लगता है कि इन तीनों प्रतिक्रियाओं में दम है, गुस्सा है, क्षोभ है इस देश की जनता का। क्या ये पहली बार नहीं है कि आतंकी हमले हो गए और कहीं भी हिंदू-मुस्लिम दंगों की खबर नहीं है या उसकी बात नहीं हो रही है? &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="http://in.youtube.com/watch?v=qRufaICth0Q"&gt;इस बार के हमले अलग हैं&lt;/a&gt;.. ये अलग हैं उन तमाम बम विस्फोटों से जो अब तक होते आए हैं। इसके सबसे निकट शायद &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/2001_Indian_Parliament_attack"&gt;भारतीय संसद पर हमला&lt;/a&gt;  या &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/September_11,_2001_attacks"&gt;11 सितंबर को वर्ल्ड ट्रेड टावर&lt;/a&gt; को उड़ाने की घटनाएं आती हैं। बात ये नहीं है कि 200 से ज्यादा लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी॥बात ये है कि इस बार का हमला आतंक के सबसे विकराल रूप को लेकर आया है.. इस बार के सारे आतंकवादी बिल्कुल मिलिट्री कमांडोज़ की तरह ट्रेंड थे। अपने आत्मघाती अभियान में अधिकतम क्षति का लक्ष्य लेकर तो चले ही थे लेकिन साथ-साथ उन्हें ये भी पता था कि भारतीय कंमाडोज़ के साथ होने वाली लड़ाई में SURVIVE कैसे करना है। कैसे इसे लंबा खींचना है.. मीडिया का कैसे उपयोग करना है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये मॉडल कुछ सालों पहले तक &lt;a href="http://worldblog.msnbc.msn.com/archive/2008/10/23/1584456.aspx"&gt;बेरूत में होने वाले आतंकी हमलों &lt;/a&gt;की याद दिलाता है, जहां इसी तरह रात को सरेआम लोगों पर गोलियां बरसने लगती थीं और किसी बहुत ही महत्वपूर्ण इमारत को पहले बंधक और बाद में उड़ाने की कोशिश की जाती थी। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;संकेत साफ हैं कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद संगठित हो रहा है/हो चुका है और बैनर तो एक ही है-&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Al_Qaeda"&gt;अल-कायदा &lt;/a&gt;का। अब उसके तले हम और आप चाहे जितने नाम देते रहें, &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Lashkar-e-Toiba"&gt;लश्कर-ए-तय्यबा&lt;/a&gt; कहें या &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Harkat-ul-Jihad-al-Islami"&gt;हरकत-उल-जिहाद(हूजी)&lt;/a&gt;। उद्देश्य सबके एक ही हैं - &lt;strong&gt;अंधेरा कायम रहे, आतंकवाद जारी रहे&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल इस घटना पर मैं कैसे रिएक्ट करूं ये पता नहीं है। मुझे खुद नहीं मालूम कि क्या भरा&lt;br /&gt;पड़ा है मेरे भीतर - गुस्सा, क्षोभ, निराशा, नाराजगी, राजनीतिक तंत्र को फांसी पर लटका दो टाइप के जज्बात। पता नहीं है और अभिव्यक्त भी नहीं कर पा रहा हूं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;जब &lt;a href="http://news.yahoo.com/nphotos/Mumbai-Terror-Attacks/ss/events/wl/112608mumbaiterroris"&gt;26 नवंबर को आतंकवादी हमले &lt;/a&gt;की खबर आई, मैं दफ्तर से घर निकलने की तैयारी में था। &lt;a href="http://zeenews.com/"&gt;ज़ी न्यूज़ &lt;/a&gt;और दूसरे चैनल इसे दिखाने लगे लेकिन किसी को पता नहीं था कि क्या हुआ/क्या हो रहा है? गैंगवार, बम विस्फोट से लेकर हर तरह की संभावनाएं न्यूज़ चैनल्स तलाश रहे थे। घर पहुंच कर पता चला कि ये आतंकवादी हमला है। थोड़े से अंतराल में 10 जगहों पर हमले हुए। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;तब से तीन दिन टीवी पर ये तमाशा देखा.. तमाशा इसलिए क्योंकि हमारे टीवी चैनल्स के लिए लाइव टीवी या रियल्टी टीवी का ये बढिया मौका था और हर चैनल ने इसे जम कर भुनाया। भारत पर हुए हमले को हमारे चैनलों ने एक तमाशे में बदलने की भरपूर कोशिशें की .. जिस रिपोर्टर के मन में जो भी आता, वही बात वो दुहराता और सनसनी की चाशनी में डुबोने की कोशिश करता। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;जब तक चैनल्स को ये बात सूझती कि उनका उपयोग किया जा रहा है, तब तक तो देर हो चुकी थी। आतंकियों के सरगना टीवी देख कर अपने गु्र्गों को उनके खिलाफ ली जा रही पोजीशन्स बताते रहे और शायद इसीलिए तीन घंटे की लड़ाई तीन दिन तक चली।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बात सनसनीखेज थी भी। हमने/आजाद भारत ने कभी नहीं देखा था ऐसा हमला। ये केवल मुंबई पर हमला नहीं था.. ये &lt;a href="http://in.youtube.com/watch?v=F2qZEiZMgWs"&gt;भारत पर हमला था, भारत की संप्रभुता पर हमला &lt;/a&gt;था।   &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस बात को बीते हुए भी 3 दिन हो चुके हैं, चौथा दिन होने वाला है। लेकिन अभी तक क्षुब्ध हूं। किस से, किस पर ? पता नहीं .. शायद खुद पर/सरकार पर/राजनीतिक तंत्र पर .. पता नहीं है कि किस पर भरोसा किया जाय। क्षुब्धता के इसी दौर में सोमवार को दफ्तर जाने की इच्छा नहीं हुई .. छुट्टी ले ली। मन में एक भय है, आक्रोश है..&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब हमले हुए थे तो मेरी पहली प्रतिक्रिया थी कि इस देश के राजनीतिज्ञों ने हमारे खुफिया तंत्र को निकम्मा बना दिया है/राजनीति की चाशनी में डुबा दिया है। ऐसे में, किस से क्या उम्मीद की जाय? जिसकी जब इच्छा होगी, वो उस वक्त आएगा और हम पर हमला कर के चला जाएगा। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;मन में भारी ऊहापोह है। जब &lt;a href="http://bigb.bigadda.com/2008/11/27/day-218/"&gt;अमिताभ बच्चन लिखते हैं&lt;/a&gt; कि उन्हें  भरा हुआ  .32 लाइसेंसी रिवॉल्वर सिरहाने रख कर सोने के बाद भी ढंग की नींद नहीं आई तो इसमें सच्चाई दिखती है। असुरक्षा की  भावना इतनी सघन है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इसका जबाव क्या है? &lt;/p&gt;&lt;p&gt;अभी तो नहीं पता..&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-1920830158936275450?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/1920830158936275450/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=1920830158936275450' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/1920830158936275450'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/1920830158936275450'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='मुंबई पर आतंकवादी हमला'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-1791842078319610359</id><published>2008-10-06T23:12:00.003+05:30</published><updated>2008-10-06T23:33:39.946+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आत्मालाप'/><title type='text'>ब्लॉग की दुनिया में पुनरागमन</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;लगभग छह महीने पहले लिखा था मैंने आखिरी बार.. चिट्ठों की दुनिया में ही नहीं, अपनी लेखनी की दुनिया में भी। ब्लॉग की दुनिया में एक-दूसरे पर कीचड़ उछाले जाने का एक नया दौर चल रहा था और मन क्षुब्ध था कि अभिव्यक्ति का ये नया माध्यम भी उसी बीमारी का शिकार हो गया जो हमारे जीवन के हर आयाम में है। इसके बाद मैंने निर्णय किया कि बस अब बहुत हुआ, ब्लॉग को टा-टा करने का समय शायद आ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात शायद यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी... लेकिन ऐसा नहीं हुआ। छह महीने होने जा रहे हैं इन बातों को। ब्लॉग से मैंने नाता क्या तोड़ा, लिखना भी बंद हो गया। पढ़ना तो धीरे-धीरे कम होता ही जा रहा था (अखबारों और कुछ ऑल टाइम फेवरिट किताबों के अलावा इन दिनों कुछ भी नहीं पढ़ा).. अब लेखनी भी बंद हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वजहों की तलाश करें तो कमी नहीं होगी। वो कहते हैं न कि अपने-आप को जस्टीफाइ करने के लिए आदमी तर्क ढूंढ ही लेता है। ..तो तर्कों की कमी नहीं है। मसलन ये छह महीने दफ्तरी कामों के लिहाज से अब तक के सबसे व्यस्त दिनों में रहे .. ये भी कि कॅरियर को लेकर ऊहापोह भरे दिन थे और कुछ नहीं समझ में आता था कि आगे की रूप-रेखा क्या होगी (ये बात और है कि रूप-रेखा का अभी भी पता नहीं है)... ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद अपने-आप से भी मुंह चुराने की भी कोशिश कर रहा था। क्यों? ..क्योंकि अपनी अकर्मण्यता पर गुस्सा बहुत आता था। लिखने को बहुत सारे विषय दिखते थे .. मसलन मेरा पसंदीदा पेट्रोलियम सेक्टर से जुड़े विषय, महंगाई और इसके आयाम, अपने प्रदेश में आई महाप्रलय, बम विस्फोट....... यानि लिखने के लिए विषय की कमी नहीं है.. पहले भी नहीं थी और अभी भी नहीं है। लेकिन जब लिखने बैठता तो 8-10 लाइनों के बाद उंगलियां दर्द करने लगतीं, सिर भारी होने लगता और फिर वो ही आलस सिर चढ़ कर बोलने लगता। छुट्टी के दिन तो बस और बस बिस्तर पर लेटे-लेटे टीवी देखने में ही बीते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो उंगलियां दर्द करतीं और फिर मैं उंगलियां चटकाता और लेखनी की हो जाती छुट्टी.. उन दिनों एक सवाल बार-बार मन में कौंधता रहता कि क्या हम सब कलम के बजाय टाइपराइटर के (या यूं कहें कि कंप्यूटर के की-बोर्ड) के सिपाही हो कर रह गए हैं। कलम उठाने पर मेरी (या हमारी?) उंगलियां क्यों दर्द करती हैं ..जबकि हम तो पत्रकार हैं। या कहीं ऐसा तो नहीं कि टीवी वाली मुफ्तखोरी की आदत लग गई कि स्साला.. नोट्स लेने की जरूरत क्या है ..मोटी-मोटी बातें लिख डालो और कैमरे के पीछे खड़े होकर महत्वपूर्ण बाइट्स की काउंटर नोट करते रहो और ऑफिस में स्टोरी की एडिटिंग के दौरान उसको लगा दो। किस्सा खत्म। नोट्स लेने की जरूरत क्या है, यहां तो इतने सोर्स हैं खबरों के। खैर, तो लगता है कि विषयांतर हो गया। हां, तो मैं कह रहा था कि उन दिनों अक्सर मैं अपने-आप से सवाल पूछता कि क्या हम सब कलम के बजाय टाइपराइटर या की-बोर्ड के सिपाही हो गए हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सवाल का जबाव तो मेरे पास नहीं है ..लेकिन मन बार-बार यही कहता है कि हम-सब की-बोर्ड के ही सिपाही हो कर रह गए हैं। लेकिन इस पर विस्तृत बात फिर कभी। अभी तो बात ब्लॉग की दुनिया में वापसी की ही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता अक्सर पूछते रहते हैं फोन पर कि इन दिनों क्या लिखा-पढ़ा? फ्रेंड-फिलॉस्फर-गाइड की भूमिका निभाने वाले पिता से झूठ बोलने की हिम्मत नहीं होती है और इसलिए उनके सवाल को हां-हूं करके टालने की ही कोशिश करता रहा हूं। लेकिन अपने-आप से इस सवाल को कैसे दूर किया जाय।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इसका शायद सबसे बेहतर उत्तर यही है कि वापस अपनी उसी दुनिया में लौटा जाय जिसे मैं सबसे ज्यादा जानता हूं। अगर अनजाने का संधान ही करना हो तो जाने को त्याग कर नहीं, उसके साथ बरकरार रह कर। इसलिए फिर लौट रहा हूं अपनी उसी दुनिया में। लिखने-पढ़ने की दुनिया.. जिसे मैं सबसे ज्यादा जानता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और ब्लॉग तो बस एक माध्यम है .. अभिव्यक्ति का ..जहां खुद को छपवाने के लिए आपको प्रकाशकों के चक्कर नहीं लगाने पड़ते। ये बात और है कि गिने-चुने ही लोग आपको प्रतिक्रिया देते हैं और इनकी प्रतिक्रियाएं इस पूरे तंत्र पर दिखता है। &lt;a href="http://sarathi.info/"&gt;अग्रज सारथी शास्त्रीजी&lt;/a&gt; का घोषित लक्ष्य है कि हिंदी में 50 हजार चिट्ठाकार हों और वो भी एक नियत समय के भीतर (ब्लॉग की दुनिया से दूर रहने के चलते ये याद नहीं है कि संख्या 50 हजार है या 10 हजार और समयसीमा क्या है)। इस मंशा पर मुझे कोई शक नहीं है लेकिन भीड़ जुटाने से मुझे कोई फायदा नहीं नजर आता अगर उसका कोई सृजन में योगदान न हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगता है फिर विषय से भटक गया मैं। पिताजी की बात याद आती है जो शायद उपेन्द्रनाथ अश्क को उद्धृत करके कहते थे कि उनके साहित्यकार बनने में बड़ी भूमिका रही उनके अपने विचारों को नोट करने के आदत की.. जो भी बात दिमाग में आए उसे कहीं लिख डालो, भले ही उसका कोई उपयोग नहीं हो। आज सोचने में पिताजी की ये बात बड़ी अच्छी लगती है लेकिन नोट्स लेने की आदत शायद पढ़ाई के साथ ही खत्म हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर इन सब पर बातचीत फिर कभी। अभी तो अपनी दुनिया में वापस आने का जश्न मनाने का समय है। इसलिए ये बात यहीं तक। प्रयास यही रहेगा कि अब नियमित रूप से कुछ-न-कुछ बाहर आता रहे और तकनीक के इस रूप का ज्यादा-से-ज्यादा लाभ उठाया जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;इस&lt;/span&gt; दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,&lt;br /&gt;आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,&lt;br /&gt;यह &lt;a href="http://www.dushyantkumar2006.blogspot.com/"&gt;अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;-&lt;a href="http://hi.literature.wikia.com/wiki/à¤¦à¥à¤·à¥à¤¯à¤à¤¤_à¤à¥à¤®à¤¾à¤°"&gt;दुष्यन्त कुमार&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-1791842078319610359?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/1791842078319610359/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=1791842078319610359' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/1791842078319610359'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/1791842078319610359'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='ब्लॉग की दुनिया में पुनरागमन'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-2854868523149779527</id><published>2008-04-12T01:15:00.003+05:30</published><updated>2008-04-12T01:38:46.787+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जाति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><title type='text'>ब्लॉग स्पेस की गंदगी और जातिवाद</title><content type='html'>अजब हालत है इन दिनों हिंदी ब्लॉग स्पेस की। कुछेक ब्लॉग्स पर एनॉनिमिटी की आड़ लेकर व्यक्तिगत चरित्रहनन की हर संभव कोशिश हो रही है। मतैक्य नहीं हो.. ये तो ठीक है लेकिन विचारों पर आपत्ति के बजाय व्यक्ति पर हमला किया जाय.. इससे मैं तो सहमत नहीं हूं। &lt;strong&gt;क्या हम इतने असहिष्णु हो गए हैं &lt;/strong&gt;या होते जा रहे हैं कि एक-दूसरे की बात भी न सुनें...&lt;strong&gt;विचार का सम्मान मत करिए लेकिन लोगों को अपने विचार रखने का मौका तो दीजिए।&lt;/strong&gt; दिक्कत यही है कि इसी तर्क की आड़ लेकर विचारों के बहाने एक-दूसरे पर कीचड़ उछाला जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एनॉनिमिटी से मुझे आपत्ति नहीं है लेकिन आपत्ति चरित्रहनन के प्रयासों पर है। अपने को गुमनाम रखने का हर आदमी को हक है, ये भी हक है कि लोकतंत्र में बिना अपने को प्रकट किए अपनी बात रखे। लेकिन इसे अगर निजी जिंदगी या किसी के चरित्र से जोड़ दिया जाए तो मुझे आपत्ति है। &lt;strong&gt;विचारों की असहमति का स्वागत है... &lt;/strong&gt;आखिर पांचों उंगलियां एक जैसी नहीं होती, लेकिन पांचों अगर आपस में ही लड़ने लगे तो हो गया कल्याण हाथ का। कुछ भी करने के लायक नहीं बचेंगे हम। और फिर इतने पढ़े-लिखे होने का कोई फायदा नहीं है (नहीं पढ़े-लिखे होते तो संचार के इस आधुनिकतम माध्यम यानी ब्लॉग का उपयोग तो नहीं ही कर रहे होते ; इक्के-दुक्के अपवाद हो सकते हैं, सब नहीं) ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक असंवेदनशील समाज की ओर हम सब बढ़ रहे हैं, जिसमें अपनापन बिल्कुल भी नहीं है, दूसरे की बात सुनने का धैर्य नहीं है.. केवल, और केवल अपनी बात हम सब सुनना-सुनाना चाहते हैं। &lt;strong&gt;अपनी बात और दूसरे की जोरू आजकल शायद हम सबको सबसे प्यारी लगने लगी है। &lt;/strong&gt;और इससे मैं चिंतित भी हूं, परेशान भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.mohalla.blogspot.com/"&gt;मुहल्ले &lt;/a&gt;ने एक अच्छी बहस करने की कोशिश की थी भारतीय जाति व्यवस्था पर &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2008/04/blog-post_7805.html"&gt;रवीश के लेख&lt;/a&gt; के बहाने। लेकिन बहस का रूख अतिवाद की ओर चला गया। मोहल्ले के विरोधियों ने इस बहाने अविनाश और &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2008/04/blog-post_8261.html"&gt;इस मत के लोगों पर हमले &lt;/a&gt;शुरू किए तो मोहल्ले ने अपनी गलियों में &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2008/04/blog-post_08.html"&gt;बहस को कुछ ऐसे मोड़ दिया&lt;/a&gt; मानो इस बहाने वो देश से जाति खत्म करके ही रूकेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवर्ण होने के बावजूद जातिवाद का मैं समर्थक नहीं हूं और मानता हूं कि भारत के इतिहास में (अगर इसे 5-10 हजार साल पुराना मानें या दो-ढ़ाई हजार साल पुराना) &lt;strong&gt;आदमी द्वारा अपने ही जैसे आदमी के खिलाफ रचा गया अब तक का सबसे बड़ा सबसे बड़ा षड्यंत्र था।&lt;/strong&gt; दिक्कत ये है कि हम अब तक इससे उबर नहीं पाए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मेरे जैसे कई लोग होंगे जिन्हें फिर भी आशा की किरण दिखती है। समाज सुधार के आंदोलनों के चलते आज ये पिछड़ा वर्ग (जिन्हें ब्राह्मणों ने शूद्र करार दिया और हम दलित कहते हैं) अपने हक की लड़ाई लड़ रहा है। आजादी के पहले 40-42 सालों में हो सकता है कि ये इतना मुखर न रहा हो, लेकिन पिछले 18 सालों में तो क्रांतिकारी बदलाव हुए हैं(अगर हम पहले के सालों को पैमाना मानें तो)। हो सकता है कि जितनी बदलाव की अपेक्षा कुछ लोगों ने की हो, वो बदलाव उस हद तक न हुआ हो... &lt;strong&gt;लेकिन क्या कुछ भी नहीं बदला है ? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2008/04/blog-post_3360.html"&gt;मीडिया में जाति का जो सर्वे&lt;/a&gt; जितेंद्रजी, चमड़ियाजी और योगेंद्रजी ने किया वो अपने आप में अद्भुत है और ऐसे कई सर्वे की हमें जरूरत है। &lt;strong&gt;हमें सच में ऐसे सर्वे चाहिए&lt;/strong&gt; जो बता सके कि फलानी जगह, फलाने सेक्टर में किस जाति के कितने लोग हैं। तभी एक सही तस्वीर सामने आ सकेगी और सवर्णों को वर्चस्व भी घटेगा। लेकिन इसके साथ ही ये भी सच है कि &lt;strong&gt;भले एक मुट्ठी ही सही लेकिन क्या इतने भी दलित, इतने भी ओबीसी मंडल कमीशन लागू होने से पहले मीडिया में थे ? &lt;/strong&gt;मुझे लगता है कि जबाव ‘नहीं’ में होगा। इसी तरह क्या जितने पिछड़े वर्ग के लोग आज सरकारी नौकरी में हैं, क्या 1990 में (प्रतिशत के हिसाब से) इतने लोग थे सरकारी नौकरी में ? एक बार फिर मुझे ‘नहीं’ में ही उत्तर दिखता है। तो वजह हम भी जानते हैं कि सवर्णों (ब्राह्मणों) के वर्चस्व के चलते मंडल कमीशन से पहले इस दिशा में इतनी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दलितों को आरक्षण तो संविधान लागू होने के समय से ही मिल रहा है लेकिन आंकड़े उठा कर देख लीजिए... 1990 तक किसी भी साल उनके लिए आरक्षित सीटें आपको पूरी तरह भरी नहीं मिलेगी। सवर्णों या यूं कहें कि &lt;strong&gt;सदियों पहले ब्राह्मणों ने ऐसा मजबूत जाल बुना था जातिवाद का जो हम आज तक पूरी तरह नहीं काट पाए हैं।&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ये कहना भी गलत होगा कि ये पूरी तरह अक्षुण्ण है। बल्कि थोड़ा-बहुत टूटने के चलते ही आकांक्षाएं औऱ भी बढ़ गयी हैं और विरोध और भी प्रबल होता जा रहा है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। और लोग न भी करें, मैं तो स्वागत करता हूं.. ये भी कोशिश करता हूं कि इस जाल का जितना टुकड़ा तोड़ सकूं वो तोड़ता रहूं। अब लोग चाहे जितना गरियायें। भाई, जब बरगद टूटने लगेगा तो कईयों का आसरा, कईयों की जिंदगी छिन ही जाएगी, कईयों की मठाधीशी तो खतरे में पड़ेगी ही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;---------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;और अंत में&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वैसे &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/08/blog-post_06.html"&gt;अविनाशजी का मीडिया प्रेमं&lt;/a&gt; मुझे हमेशा से चकित करता रहा है। न जाने क्यों वो हर बात को घुमा-फिरा कर मीडिया पर ही ले आते हैं। ये बात और है कि उनके इतने प्रयासों के बाद &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/08/blog-post_9487.html"&gt;&lt;strong&gt;(अगर हम इसे प्रयास मानें तो)&lt;/strong&gt; &lt;/a&gt;भी परिदृश्य अब तक वैसे का वैसा ही है। ना तो उनके चैनल में कहीं कुछ बदला है और न ही किसी दूसरे चैनल या अखबार में। हां, &lt;a href="http://baatbolegi.blogspot.com/2007/07/blog-post.html"&gt;हमलोगों ने गलथोथी खूब की है&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/07/blog-post_28.html"&gt;खूब स्यापा किया है&lt;/a&gt;। शायद ये मोहल्ले की ही मेहरबानी है कि हिंदी ब्लॉग स्पेस में इस पर लिखने वाले और इससे जुड़े ब्लॉग्स की भरमार हो गयी है और आम जिंदगी के, समाज के कई मुद्दे पीछे छूट गए हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-2854868523149779527?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/2854868523149779527/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=2854868523149779527' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/2854868523149779527'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/2854868523149779527'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2008/04/blog-post.html' title='ब्लॉग स्पेस की गंदगी और जातिवाद'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-7142518856615191246</id><published>2008-03-17T01:26:00.003+05:30</published><updated>2008-03-17T01:44:56.462+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पिता'/><title type='text'>पिता की चिता जलाते हुए</title><content type='html'>&lt;em&gt;दिनेश कुशवाहजी की ये कविता है जो हंस के अप्रैल 2000 के अंक में पढ़ी थी। कई बार चाहा कि उनसे संपर्क करूं और केवल इसी कविता के लिए उनको सराहूं। लेकिन मैं ऐसा कर नहीं पाया और इसकी वजह सिर्फ मेरा आलसी होना रहा है। आज भी मैं उनको इसी कविता से जानता हूं और बिना उनकी इजाजत के इसे यहां डाल रहा हूं। दरअसल &lt;a href="http://dilli-darbhanga.blogspot.com/"&gt;अविनाशजी के दिल्ली-दरभंगा &lt;/a&gt;से जाना कि &lt;a href="http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/03/blog-post.html"&gt;रवीशजी के पिताजी नहीं रहे। &lt;/a&gt;उन्हें मेरी श्रद्धांजली, रवीशजी और परिवारजनों के लिए मेरी संवेदनाएं। इसी घटना ने मन के कोल्ड स्टोरेज में सहेजी इस कविता की याद दिला दी। और जब ये कविता याद आयी तो बहुत याद आयी। पुरानी फाइलों में से इसे ढूंढ़ कर आज इसे कई बार मैंने पढ़ा॥ खूब पढ़ा। लगा कि सबके साथ इसे बांटना चाहिए, तो इसलिए इसे यहां डाल रहा हूं ताकि अच्छी कविता की महक सब महसूस कर सकें।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;पिता की चिता जलाते हुए&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कुछ बातें अक्सर कहते थे पिता..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भादों की किसी विकट काली रात में&lt;br /&gt;जब छप्पन कोटि बरसते हों देव&lt;br /&gt;अपने निकट बहने वाली नदी को&lt;br /&gt;उसकी समग्र भयावहता में देखो&lt;br /&gt;और कल्पना करो कि&lt;br /&gt;यमुना को कैसे पार किया होगा वसुदेव ने&lt;br /&gt;एक नवजात बच्चे के साथ !&lt;br /&gt;तुम्हें लेकर जीवन की वैतरणी को&lt;br /&gt;कुछ इसी तरह पार किया है मैंने&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अघाए हुए और रिरिआते आदमी की&lt;br /&gt;हंसी में फर्क करना सीखो&lt;br /&gt;अभागा आदमी का बच्चा&lt;br /&gt;जन्मते ही रोना शुरू करता है&lt;br /&gt;जिंदगानी की कहानी उसी समय शुरू हो जाती है&lt;br /&gt;फटी धोती, टूटी झोपड़ी, डंसी देह और कुचली आत्मा ने&lt;br /&gt;गरीब को एक अदद अधम शरीर बना दिया&lt;br /&gt;पंचतत्व तो आज भी अमीरों की चाकरी में लगे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए जनता को शास्त्र नहीं / कविता से शिक्षित करो&lt;br /&gt;साधुता को श्रम से जोड़ो / भिक्षा से मुक्त करो&lt;br /&gt;साधुता वहां बसती है / जहां जूता गांठते हैं रैदास&lt;br /&gt;चादर बुनते हैं कबीर ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बतरस के तो रसिया थे पिता&lt;br /&gt;कोई नहीं मिलता तो / बैलों से ही बोलते-बतियाते&lt;br /&gt;इधर कुछ दिनों से उसी पिता को&lt;br /&gt;देख कर आश्चर्य होता था मुझे&lt;br /&gt;कि दुनिया में आदमी / कैसे रहता है इतना चुपचाप !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्वास नहीं होता कि बप्पा सपना हो गए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्हें देख कर लगता था कभी&lt;br /&gt;कि गांव-जवार, खेत-खलिहान&lt;br /&gt;इसलिए जवान हैं कि पिता जवान हैं&lt;br /&gt;कुएं का पानी सूख जाएगा&lt;br /&gt;पर पिता की जवानी नहीं खत्म होगी&lt;br /&gt;लेकिन औचक्क चले गए पिता..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता के पास एक पुश्तैनी कोट था&lt;br /&gt;जब जंगल और मैदान जाड़े से कांपने लगते&lt;br /&gt;पिता उसे पहन कर आगी तापते थे&lt;br /&gt;गांव से सटकर बहती सरयू के किनारे&lt;br /&gt;कभी आग के फूल की तरह खिले थे पिता&lt;br /&gt;और आज वहीं आग की नदी में नहा रहे थे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहले पिता के दोनों पांव&lt;br /&gt;जलते हुए झूल गए / जैसे उतान लेटे हुए पिता ने&lt;br /&gt;टांगें बटोर ली हों और कह रहे हों&lt;br /&gt;अब नहीं चल पाऊंगा तुम्हारे साथ ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लपटों के बीच लाल अंगार पिता&lt;br /&gt;और अस्त होते सूर्य का रंग / एक जैसा दिख रहा था&lt;br /&gt;बस नहीं दिख रहीं थीं तो उनकी आंखें&lt;br /&gt;जिनके तनिक लाल होते ही&lt;br /&gt;हम भाई-बहनों की कंपकपी छूट जाती थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पचास पार करते ही पिता की वही आंखें&lt;br /&gt;हर भावुक प्रसंग पर डबडबा जाती थीं,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिरायंध गंध में सना / चिट-चिट का चरचराता शोर&lt;br /&gt;मन में मचे कोहराम में डूब गया था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता ने जीवन भर चलाया था मन भर का हथौड़ा&lt;br /&gt;लोहे को देते रहे तरह-तरह की शक्ल&lt;br /&gt;पर अब बीड़ी के जले ठूंठ ही उनकी याद दिलाएंगे&lt;br /&gt;कि धौंकनी-सी थी उनकी छाती / थाली में रखा चुटकी भर नमक&lt;br /&gt;और एक हरी मिर्च थी उनकी आंखें ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भुलाए नहीं भूलेंगे उनके जीवन के दुख&lt;br /&gt;जलते रहेंगे मेरे भीतर दीए की टेम की तरह&lt;br /&gt;भर-भर आएगा मेरा मन जैसे&lt;br /&gt;नाभि में अनायास भरती है कपास&lt;br /&gt;जब भी सूखेंगे मेरे होंठ&lt;br /&gt;पिता के पपड़ाए खेत याद आएंगे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                               - दिनेश कुशवाह&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-7142518856615191246?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/7142518856615191246/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=7142518856615191246' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/7142518856615191246'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/7142518856615191246'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2008/03/blog-post.html' title='पिता की चिता जलाते हुए'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-8865074489138516294</id><published>2007-11-04T22:54:00.000+05:30</published><updated>2007-11-04T22:54:21.313+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लोग के नखरे'/><title type='text'>ब्लोग के नखरे</title><content type='html'>ये ब्लोग भी अजीब चीज है। सुधारने बैठा जेएनयू वाले अपने पुराने पोस्ट को तो सारा का सारा फिर से पोस्ट हो गया। वह भी बस इसलिए कि कहीं किसी के ब्लोग पर ही पढा कि भाई जब किसी की चर्चा करें तो उससे जुडे हुए लिंक्स देने मे  कंजूसी ना करे। वो ही लिंक्स लागने बैठे तो सारा फिर से पोस्ट हो गया। खैर कोई बात नहीं आगे से इसका भी ध्यान रखूंगा। बहरहाल, अब मंहगाई पर रिसर्च कर रह हूँ। अगली पोस्ट शायद वो ही होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब तक के लिए विदा होता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धन्यवाद&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-8865074489138516294?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/8865074489138516294/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=8865074489138516294' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/8865074489138516294'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/8865074489138516294'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/11/blog-post.html' title='ब्लोग के नखरे'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-200913542010516521</id><published>2007-11-04T22:40:00.000+05:30</published><updated>2007-11-04T22:40:03.937+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपना पागलपन'/><title type='text'>चंद्रशेखर, जेएनयू और आज की छात्र राजनीति-3</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;em&gt;इस तीसरी कड़ी में कुछ भी नया नहीं है, बस पिछले दो भागों का समापन है। लेकिन संयोगवश इंटरनेट पर सर्च को दौरान &lt;a href="http://teesraraasta.blogspot.com/"&gt;आनंद प्रधानजी&lt;/a&gt; का एक &lt;a href="http://teesraraasta.blogspot.com/2007/09/blog-post_3923.html"&gt;पुराना लेख छात्र राजनीति पर &lt;/a&gt;मिला। इसके लिंक को साथ जोड़ रहा हूं क्योंकि वो ज्यादा सारगर्भित है। &lt;/em&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;em&gt;“Any man who is not a communist at the age of twenty is a fool. Any man who is still a communist at the age of thirty is an even bigger fool.” -George Bernard Shaw&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;.. धीरेःधीरे मेरे बिना किसी कोशिश के मुझे ABVP का मान लिया गया और तभी मैंने Alternative को तलाशा और ABVP से जुड़ गया। विद्यार्थी परिषद की विचारधारा मेरी आज भी नहीं है और &lt;a href="http://www.blogger.com/www.jnu.ac.in"&gt;जेएनयू&lt;/a&gt; के दिनों में भी परिषद के लोगों से मेरी बहस इसी बात पर होती रही। पता नहीं कितने तरीकों से मुझे संघ की विचारधारा से जोड़ने की कोशिशें हुईं और हर बार वे नाकाम रहे। जो मुझे अच्छा&lt;br /&gt;लगता, वो ही मैं करता। लेकिन पार्टी-पॉलिटिक्स का अंग होने से अब मैं निष्पक्ष नहीं रह गया था और मेरी असहमति के बावजूद विद्यार्थी परिषद के फैसलों से मैं खुद को अलग नहीं कर सकता। हालांकि छात्र राजनीति से जुड़ने के अपने निर्णय से मैं कभी संतुष्ट नहीं रहा और इसलिए छात्रसंघ के चुनावों में सिवाय पहली बार के कभी भी किसी को वोट नहीं दिया (हर बार बैलेट पेपर खाली छोड़ कर आया)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में तो ये एक प्रकार की हॉबी हो गयी कि कैसे SFI-AISF के लोगों को प्रताड़ित कर सकूं ...बाद-विवाद से, चिल्ला कर, हंगामा कर या उनका मजाक बना कर। मारपीट से निजी तौर पर तो मैं दूर रहा लेकिन शायद मार-पीट की संस्कृति को जेएनयू में बड़े पैमाने पर फैलाने का काम विद्यार्थी परिषद और SFI-AISF के लोगों के बीच हुई झड़पों ने किया। यूं तो मेरे कई दोस्त कम्युनिस्ट थे.. हॉस्टल और कैम्पस दोनों में लेकिन ABVP, SFI-AISF एक-दूसरे को झेलने को एकदम तैयार नहीं थी और हर दूसरी चौथी बात पर मार-पीट होना आम बात हो गयी थी। फिर होता ताकत का प्रदर्शन यानी प्रोसेशन-मशाल जुलूस-डाउन-डाउन का दौर ... &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जेएनयू को याद करें तो गंगा ढ़ाबा को नहीं भूला जा सकता है, जो सारी गतिविधियों का केंद्र था। दो-दो, तीन-तीन बजे तक हम वहां बहस करते और अक्सर बहस के लिए बहस करते। लेकिन Polititcal Strategies बंद कमरों में ही बनतीं । &lt;/p&gt;&lt;p&gt;NSUI जेएनयू में तो Non-Existant थी लेकिन DU में विद्यार्थी परिषद और NSUI के बीच ही सीधा मुकाबला होता था। आश्चर्यजनक ढंग से मैंने अपने को जेएनयू के बाहर की गतिविधियों से बचाये रखा लेकिन मैं मानता हूं कि DU में ABVP-NSUI ने जो गंध मचायी उसने वर्तमान छात्र राजनीति की रीढ़ तोड़ कर रख दी। पैसे का खेल तो DU में पहले भी होता था , लेकिन नंगा नाच उसी समय में शायद शुरू हुआ। देश के बाकी हिस्सों की भांति ही DU में कम्युनिस्ट मुट्ठी भर ही हैं और उस समय भी रहे। एक अच्छे नेतृत्व का अभाव या जेएनयू जैसा क्लोज़्ड कैम्पस न होने की विवशता या DU की Elitist Mentality ... वजह बहुत सारे हैं &lt;/p&gt;&lt;p&gt;और इसलिए वहां साम्यवाद नहीं ठहर पाया, जबकि ABVP या NSUI जैसे छात्र संगठनों का छात्र आंदोलन खड़ा करने की कभी नीयत ही नहीं रही। इन्हें बस वोटर्स चाहिए थे जो पैसे के बल पर खरीदे जा सकें। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन वोट्स के जरिए अपना भविष्य चमकाने का सबसे बेहतर रास्ता था जेएनयू-डीयू का इलेक्शन। जो जीता वो राष्ट्रीय नेताओं की नजरों में आ जाता और उसका राजनीतिक भविष्य चमकदार हो जाता। ये उस समय भी सत्य था और आज भी सच है। यूथ कांग्रेस का प्रेसीडेंट अशोक तंवर है, जो हमारे समय का ही है और अपनी तमाम अयोग्यताओं के बावजूद NSUI का प्रेसीडेंशिएल कैंडीडेट होता रहा। जेएनयू के लिहाज से उसको बोलना भी नहीं आता था लेकिन अपनी ठेठ राजस्थानी अंदाज के लिए ही वो जाना जाता और हर साल 300-400 वोट बटोर लेता। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्या आपने कभी छोटे शहरों के या राज्यों के विश्वविद्यालयों के नेताओं को किसी छात्र संगठन का अध्यक्ष बना देखा है ? पैसा फेंको, तमाशा देखो ये उस समय भी सच था और आज भी है। अंतर बस इतना है कि उस समय केंद्र में BJP का बोलबाला था तो ABVP की तूती बोलती थी और आज जब कांग्रेस का जमाना है तो NSUI आग मूत रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये उस समय का भी सच था और आज भी है। सिद्धांत शायद जेएनयू में ही बघारे जाते हैं। कलकत्ता या तिरूअनंतपुरम में आप जैसे CPM-CPI के खिलाफ नहीं बोल सकते, वैसे ही SFI-AISF के खिलाफ भी नहीं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये भी एक सच है कि मेरे विद्यार्थी जीवन में कुछ जगहों को छोड़ कर छात्र आंदोलन कभी था ही नहीं, कहीं था ही नहीं। जेएनयू, डीयू, एएमयू, बीएचयू, मैसूर, शायद उत्कल विश्वविद्यालय या ऐसी कुछ और जगहें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन जगहों में छात्र संगठन बस दंगा-फसाद खड़ा करना जानते थे और आज भी यही करते हैं। पटना, इलाहाबाद में NSUI, ABVP, AISA, SFI वगैरह हैं तो लेकिन इनकी लोकप्रियता छात्रों के बीच नहीं है। इन जगहों पर या अतीत के इन जैसे गौरवशाली पृष्ठों पर अब बस वो ही लोग छात्र राजनीति से जुड़ते हैं जो जिंदगी में और कुछ नहीं करना चाहते। इनसे आप बहस, वाद-विवाद की उम्मीद नहीं कर सकते.. हां, मारना-काटना, बम फोड़ना हो तो इन्हें बताएं। चाकू-छुरे-कट्टे इनके लिए पुराने हो गए.. इनसे आप बाकायदा रिवॉल्वर की मांग कर सकते हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जेएनयू में बहस की परंपरा थी और खास कर चुनावों के समय तो ये चरम पर होता। प्रेसीडेंशिएल डिबेट को सुनना एक साथ कई अनुभवों से गुजरना होता था। लेकिन जेएनयू की इस गौरवशाली परंपरा के अवसान के चिह्न हमारे समय में ही दिखने लगे थे, जब कैंडीडेट्स बहस के बजाय चिल्लाने ज्यादा लगे थे और जिनकी बातों का कोई सर-पैर नहीं होता था। आज के जेएनयू में यदि आप गल्ती से प्रेसीडेंशिएल डिबेट के दिन चले जाएं तो आप इसे खुद भी परख सकते हैं। फिर भी हमारे जैसे लोग आज भी वहां जाते हैं क्योंकि वो डाउन-डाउन, वो मार्च ऑन-मार्च ऑन आज भी हमारे खून को थोड़ी देर के लिए ही सही पर उबाल देता है। एक दूसरा आकर्षण भी होता है कि अपने समय के लोग मिल जाते हैं और उस जमाने में हम जिसे गाली देते थे, अब उनसे गलबहियां डाल कर चाय पीते हैं। ये कहीं और नहीं होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डीयू जैसी जगहों पर जब हम कैम्पेनिंग के लिए जाते तो लोग हमारी और ऐसे देखते कि जैसे हम किसी अजायबघर से उठ कर आए हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लेकिन ये एक सच था आज भी उन यादों को जीना अच्छा लगता है और वे ही बेचैनियां आज भी बेकरार करती रहती हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;-------------- &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;फुटनोट&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मैं छात्र राजनीति को किसी दिशा देने की वकालत नहीं कर रहा हूं। मुझे साफ-साफ लगता है कि जिस हिसाब से समाज में खुलापन बढ रहा है, उस में हम सब इतने असंवेदनशील होते जा रहे हैं कि हम पर किसी भी बात का फर्क ही नहीं पड़ने वाला। जाहिर तौर पर छात्र भी इसके अपवाद नहीं हैं, बल्कि वे ही इसे पूरे जोर-शोर से आगे बढ़ा रहे हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक असंवेदनशील समाज की ओर हम सब बढ़ रहे हैं, जिसमें अपनापन बिल्कुल भी नहीं है, दूसरे की बात सुनने का धैर्य नहीं है.. केवल, और केवल अपनी बात हम सब सुनना-सुनाना चाहते हैं। शायद यही वजह है कि मेरी पीढी और मेरे बाद की पीढी के लिए राजनीति अब उतना बड़ा आकर्षण नहीं रह गया है जैसा कभी पहले हुआ करता था। शायद इसीलिए अब जेएनयू जैसी जगहों में भी बहस की परंपरा खत्म हो गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो जेएनयू के प्रेसीडेंशिएल डिबेट में भी कैंडीडेट्स बोलते कम हैं, चिल्लाते ज्यादा हैं (आम जिंदगी के माफिक ही) और जो बातें बातचीत के जरिए हल हो सकती हैं, उस पर हाथ उठाना आम होता जा रहा है। 2 नवंबर को जेएनयू में चुनाव हुए और 31 अक्टूबर को प्रेसीडेंशिएल डिबेट सुनने मैं कई सालों के बाद गया था। उम्मीदवारों का स्तर या भाषण की शैली देख कर वहां से भाग आया। फिर बाद में सुना कि डिबेट के दौरान ही मारपीट हो गयी और पहली बार डिबेट अधूरा छूटा। राम के नाम पर हंगामा करने वाला ब्रिगेड हमारा था यानी ABVP का , जिससे कभी मैं जुड़ा था। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;लेकिन हमारे समय से ही लोग भूलने लगे थे कि जेएनयू में छात्रों ने विद्यार्थी परिषद को क्यों आगे बढ़ने का मौका दिया था। मार-पीट हमारे समय की ही देन थी और मेरे जेएनयू छोड़ते-छोड़ते (2002) ABVP का हर सदस्य नेता बन चुका था या अपने को ऐसा दिखाता था। केंद्र में भाजपा की सरकार इसकी एक बड़ी वजह थी। और मेरे जैसे कई लोग ABVP से कटने लगे थे क्योंकि सत्ता ने इसे भी भ्रष्ट कर दिया था और जिन मुद्दों पर हम आगे बढ़े थे, हम उसे भूलने लगे थे या भूल चुके थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आख़िर में भी विद्यार्थी परिषद की चर्चा बस इसलिए की ताकि प्रेसीडेंशिएल डिबेट के दौरान हुए पत्थरबाजी की वारदात का बैकग्राउंड समझ में आ सके। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;समाप्त&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-200913542010516521?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/200913542010516521/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=200913542010516521' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/200913542010516521'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/200913542010516521'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/11/3.html' title='चंद्रशेखर, जेएनयू और आज की छात्र राजनीति-3'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-7876829941498092282</id><published>2007-11-04T22:39:00.000+05:30</published><updated>2007-11-04T22:39:01.474+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपना पागलपन'/><title type='text'>चंद्रशेखर, जेएनयू और आज की छात्र राजनीति-2</title><content type='html'>&lt;em&gt;इस प्रसंग की दूसरी कड़ी मेरे जेएनयू के राजनीतिक अनुभव हैं, संक्षेप में जेएनयू जैसा मैंने देखा, मैंने जिया (पढ़ाई के अलावा)। ये मेरे अनुभव हैं और इन पर किसी से उलझने की इच्छा भी नहीं है और खुद को ईमानदार दिखाने की कोशिश भी नहीं। बस मैं उस दौर को याद कर रहा हूं.. और कुछ नहीं&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भाग-2&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;AISA द्वारा खाली किए गए प्लेटफॉर्म को भरा ABVP ने। SFI-AISF तो हमेशा से एक तरफ थी और दूसरी तरफ AISA, ABVP, NSUI आते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, तो हमारा समय वही था, जब AISA मृतप्राय थी और नए लोग, जो कुछ कर गुजरने का जज्बा रखते थे, युवावस्था के आवेश से लबालब थे.. उन्हें ABVP के रूप में एक प्लेटफॉर्म मिला। इसीलिए चंद्रशेखर के शहीद होने के बाद ABVP जेएनयू में इतनी मुखर हो कर आयी और लोग उससे जुड़े भी। देशभर में ABVP चाहे जो भी करती रही हो पर जेएनयू में स्थानीय मुद्दों को वापस ले कर ABVP ही आयी। और ये भी सच है कि ABVP की कुख्यात छवि के चलते ही छात्राएं फिर भी कई सालों तक ABVP के पक्ष में खुल कर आने से डरती रहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ABVP को मैं इतनी जगह दे रहा हूं क्योंकि मेरा दौर वही था। हमारे जैसे लोगों को एक Aletrnative Platform की तलाश थी। कविता कृष्णन से प्रभावित होने के बाद भी जिसे AISA के बाकी लोगों से निराशा ही हाथ लगी थी। हमारे जैसे लोग जो SFI-AISF (CPM-CPI के छात्र संगठन) के दोगलेपन का मुंहतोड़ जबाव देना चाहते थे, वो ABVP से जुड़ गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;SFI-AISF के लोगों को क्यों मैं दोगला मानता हूं (हो सकता है कि दोगला शब्द के मेरे चयन से लोग सहमत नहीं हों, ये उनकी मर्जी)॥ जेएनयू में मूल रूप से वाम विचारधारा का बोलबाला रहा है और हमारा समय भी उन्हीं में से था। एक तरफ थी चंद्रशेखर की शहादत के बाद विक्षिप्त AISA जो अपने भूत में जी रही थी, दूसरी तरफ थी SFI-AISF और इसके एक बहुत छोटे से तीसरे कोने में हम सब जो SFI-AISF के वर्चस्व को खत्म करना चाहते थे। SFI-AISF के हमारे समय के लीडर कहने को तो कम्युनिस्ट थे लेकिन उनका अंदाज किसी जमींदार से कम नहीं था। अनुशासन के नाम पर छात्रों को डरा-धमका कर रखा जाता था, किसी ने यदि उनके खिलाफ कुछ बोल दिया तो उसे लुम्पेन का खिताब तो वे ऐसे देते थे कि बस .. । और एडमिशन के समय में जो उनका कैडर नहीं बना, उनको उनके प्रोफेसर्स के जरिए भी धमकाने की कोशिशें होती थीं। उन्हें लगता था कि जेएनयू उनकी बपौती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं जेएनयू में जब आया था तो शुरूआती कुछ महीनों तक किसी भी पार्टी से नहीं जुड़ा, लोगों को और उस कैम्पस को समझने की कोशिश ही कर रहा था। और फिर अचानक एक दिन मुझे लुम्पेन की केटेगरी में डाल दिया गया क्योंकि मारपीट की एक वारदात हुई और मेर कुछ दोस्त/सीनियर्स उसमें शामिल थे। मैं तो उस जगह पर था भी नहीं लेकिन मुझे वो तमगा दे दिया गया। इसकी एक वजह ये भी थी कि हमारा सेंटर ऑफ रशियन स्टडीज़ आम तौर पर ABVP के वोट बैंक के तौर पर गिना जाता था। खैर, उसके बाद से मैं उस तमगे को जब तक जेएनयू में रहा पूरे शान से सीने पर लगाये घूमता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस समय मैं AISA को खंगाल रहा था लेकिन कविता के अलावा कोई ऐसा दिखा नहीं जो सही मायने में क्रांतिकारी विचारों को जीवन में भी उतार रहा हो। फिर मुझे मेरे अनजाने में ABVP से जोड़ा जा चुका था और AISA मुझे लेने को तैयार नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;SFI-AISF के लोगों की राजनीति नाम के लिए तो कम्युनिस्ट थी लेकिन जब चुनाव के दिन आते तो छात्रों को दलित, मुस्लिम के नाम पर जोड़ने की हर संभव कोशिशें होतीं। फतवे जारी किए जाते, वैसे लोगों को चुन-चुन कर पैनल में रखा जाता जो दलित या मुस्लिम होते थे। सेंट्रल पैनल के चार नाम में एक लड़की, एक दलित और एक मुस्लिम नाम जरूर होते थे, जबकि स्कूल पैनल्स में दो मुस्लिम या दो दलित या ऐसा ही कंबीनेशन बनाया जाता। ये कोई अपलिफ्टमेंट के लिए नहीं, एपीज़मेंट के लिए होता था, ताकि वोट खींचे जा सकें। जाहिर तौर पर ये काफी सफल फॉर्मूला था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन विचारधारा की बात करने वाले, &lt;a href="http://books.google.co.in/books?id=WwTCaF6iu9sC&amp;amp;dq=Karl+Marx&amp;amp;prev=http://www.google.co.in/search%3Fhl%3Den%26q%3DKarl%2BMarx%26meta%3D&amp;amp;sa=X&amp;amp;oi=print&amp;amp;ct=result&amp;amp;cd=1&amp;amp;cad=author-navigational"&gt;मार्क्स-एंजेल्स की माला जपने वालों&lt;/a&gt; का ये रुप मैं नहीं झेल पाया। एक और बात थी कि SFI-AISF के नेता थे तो कम्युनिस्ट पर जूते एडीडास, रिबॉक या बड़े चमक-दमक वाले पहनते थे, जमींदारों-सा रहन-सहन था, JRF के पैसों से उनके कमरों में 600-800 वॉट के म्यूजिक प्लेयर बड़ी आम बात थी। शुरूआती दिनों में उनका पहनावा वही कुर्ता और जींस होता था, लेकिन 2000 आते-आते ये भी बदल गया और उनके पास अब बाइक होना भी आम हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे लिए ये मुश्किल था। घर से 1500 रुपये मिलते थे और इतने पैसों में भी बचाने की प्रवृत्ति हावी थी (हालांकि मैं आर्थिक रुप से किसी कमजोर परिवार से नहीं था और जेएनयू में रहने वाले के लिए 1500 रुपये साधारण ढंग से रहने वाले के लिए बहुत थे)। लेकिन फिर भी मुझे आश्चर्य होता था कि ये कैसे संभव है ? लोगों के पास इतने पैसे कहां से आते हैं कि इतने ऐश के साथ रह सकें और साथ ही घिन भी होती सर्वहारा की बात करने वालों के जीवन के रूप देख कर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संयोगवश ये वे ही दिन थे, जब भारत की अर्थव्यवस्था ने विकास की रफ्तार (आंकड़ों के मुताबिक) पकड़नी शुरू की थी, पब्लिक सेक्टर कंपनियों का बोलबाला समाप्ति पर था, निजी औऱ बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने घरों के दरवाजों पर दस्तक देनी शुरू कर दी थी और टीवी सिनेमा का मजबूत विकल्प बन कर सामने आने लगा था। विदेशों से हमारी नजदीकियां बढ़ने लगीं थी और एमटीवी जैसे चैनल खुलने लगे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर सी बात है कि दिल्ली के भीतर हो कर भी दिल्ली से कटा रहने वाला जेएनयू भी इससे अछूता नहीं था और बदलाव की ये बयार Day Scholars ला रहे थे यानी वो जो दिल्ली के रहने वाले थे। राजनीतिक रूप से पता नहीं क्यों पर इनमें कोई अपवाद ही होता जो वामपंथियों से जुड़ता और ABVP को जेएनयू में जगह दिलाने में इनका बड़ा योगदान था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस समय ABVP दिल्ली यूनिवर्सिटी में भी हावी थी और देश की राजनीति में &lt;a href="http://news.bbc.co.uk/1/hi/world/south_asia/463000.stm"&gt;BJP और वाजपेयी।&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-7876829941498092282?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/7876829941498092282/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=7876829941498092282' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/7876829941498092282'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/7876829941498092282'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/11/2.html' title='चंद्रशेखर, जेएनयू और आज की छात्र राजनीति-2'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-5588471933746157904</id><published>2007-11-04T22:34:00.000+05:30</published><updated>2007-11-04T22:34:21.657+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपना पागलपन'/><title type='text'>चंद्रशेखर, जेएनयू और आज की छात्र राजनीति</title><content type='html'>&lt;em&gt;पिछ्ले दिनों &lt;a href="http://samkaleenjanmat.blogspot.com/2007/10/blog-post_25.html"&gt;दिलीपजी और अनिलजी &lt;/a&gt;के बीच समकालीन जनमत के जरिए हुआ शास्त्रार्थ। विचारधारा से मेरा तो &lt;a href="http://diaryofanindian.blogspot.com/2007/10/blog-post_20.html"&gt;बाल विवाह&lt;/a&gt; नहीं हुआ लेकिन उस पर क्रश जरूर था और आज भी ये बरकरार है। बहरहाल, इसी शास्त्रार्थ के चलते प्रणय कृष्ण का &lt;a href="http://samkaleenjanmat.blogspot.com/2007/10/blog-post_23.html"&gt;चंद्रशेखर पर लिखा लेख&lt;/a&gt; फिर से पढ़ने को मिला और जाहिर तौर पर इसने कुछ पुराने घाव उभार दिए। ऐसे घाव जिन्हें कुरेदना बहुता अच्छा लगता है और अपने सपनों के बारे में सोचने को विवश करता है। चंद्रशेखर के बारे में पढ़ते हुए ये लिखना शुरू किया था और फिर पता चला कि इन दिनों &lt;a href="http://www.ndtv.com/convergence/ndtv/story.aspx?id=NEWEN20070031775&amp;amp;ch=11/4/2007%204:05:00%20PM"&gt;जेएनयू में चुनावों का मौसम&lt;/a&gt; चल रहा है। ऐसे में अपने दौर को याद करने का मौका भला कैसे छोड़ा जा सकता है। तो तीन हिस्सों में इसे प्रकाशित कर रहा हूं। &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भाग-1&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" शहीद हो जाने के बाद भी चंदू ने अपनी आदत छोड़ी नहीं है। चंदू हर रोज हमारी चेतना के थकने का इंतजार करते हैं और अवचेतन की खिड़की में दाखिल हो जाते हैं। हमारा अवचेतन जाने कितने लोगों की मौत हमें बारी-बारी से दिखाता है और चंदू को जिंदा रखता है। "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"चंद्रशेखर बेहद धीरज के साथ स्थितियों को देखते, लेकिन पानी को नाक के ऊपर जाते देख वे बारूद की तरह फट पड़ते। "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं कॉमरेड चंद्रशेखर को चंदू नहीं कह सकता क्योंकि मैने उन्हें नहीं देखा, हां उनके बारे में जानने की कोशिशें खूब की हैं। पता नहीं कितने तरह के लोगों से चंद्रशेखर के बारे में जानने की कोशिशें की हैं और उन कोशिशों से बनी समझ तो यही है कि चंद्रशेखर जैसा नेता शायद आजाद भारत को नहीं मिला। ये वो शख्स था, जिसने नेता की अवधारणा को अपने कर्मों से सही कर दिखाया था। प्रणय कृष्ण का चंद्रशेखर वाला लेख पहले भी पढ़ा था और एक बार फिर से इसे पढ़ कर अतीत की कई स्मृतियों ताजा हो गयीं। प्रणय कृष्ण ने बहुत ईमानदारी से चंद्रशेखर को चित्रित किया है। ये शायद चंद्रशेखर के साथ काम करने का परिणाम है या क्या ये नहीं जानता, नहीं मालूम कि प्रणय कृष्ण में आज भी (उन्हीं दिनों जैसी) आग बची हुई है या नहीं, क्योंकि आज के जो AISA (CPI-ML का छात्र संगठन) के लोग हैं, वो तो बस चंद्रशेखर के नाम की माला ही जपते हैं, करते कुछ नहीं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये एक बहुत बड़ा सच है कि चंद्रशेखर के प्रभाव का अवसान उनके जाने के (शहादत के) साथ ही शुरू हो गया था। आज इतने सालों बाद सोचता हूं तो एक अजीब-सा विचार बार-बार कौधता है कि क्या चंद्रशेखर के साथियों ने चंद्रशेखर के साथ दगा नहीं किया ? पता नहीं सच क्या है, लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि चंद्रशेखर जिन विचारों, जिन आदर्शों के लिए लड़े.. उन्हें उनके साथियों ने उनकी मौत के साथ ही तिलांजलि दे दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेएनयू के हिसाब से में उस पीढ़ी का हूं जो चंद्रशेखर के गुजरने के साथ ही जेएनयू में आया। ये मेरा तो दुर्भाग्य था ही कि मुझे चंद्रशेखर से मिलने का मौका नहीं मिला। लेकिन उनके जिन-जिन साथियों से मैं मिल पाया जेएनयू में, सिवाय एक-दो के बाकी सबसे निराश ही हुआ। कुछेक दिन ही हुए थे जेएनयू में जब JNUSU के चुनाव हुए और कविता कृष्णन खड़ीं थीं प्रेसीडेंट के लिए। कसम से मैंने उनके जैसा स्पीकर आज तक नहीं देखा। लोग कहते थे कि चंद्रशेखर को काश तुमने सुना होता लेकिन मैंने अपनी जिंदगी का पहला वोट केवल उस भाषण पर कविता को दिया था। उसके बाद भी केवल कविता को ही मैंने पाया सही मायनों में चंद्रशेखर की विरासत का प्रतिनिधित्व करते हुए। बाकी के तो AISA के जो लोग थे वो कमोबेश उसी हालत मे दिख रहे थे, जैसे कि आजकल भाजपा दिखती है.. सत्ता से बाहर बौखलाए हुए लोगों का झुंड, जिन्हें इतने सालों बाद भी नहीं पता चला कि आखिर वो कैसे सत्ता से बाहर हो गए या जिन्हें लगता है कि सत्ता तो बस उन्हीं का जन्मसिद्ध अधिकार है। जेएनयू में JNUSU का प्रेसीडेंट जिस पार्टी का हो, उसे लगता है कि जैसे वो एक पूरे देश पर राज कर रहे हैं और उनकी शान किसी राजा या प्रधानमंत्री से कहीं कम नहीं होती.. आज भी नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे समय में तो AISA अर्द्धविक्षिप्त थी जेएनयू में और सिवाय कुछ नारों के (जला दो, मिटा दो या चंदू, भगतसिंह.. वी शैल फाइट, वी शैल विन) के अलावा उनके पास कुछ भी ऐसा नहीं था जिसे सृजनात्मक (CONSTRUCTIVE) कहा जा सके। ये वो पार्टी थी जो लड़ती तो छात्रों के लिए थी लेकिन छात्रों को देने के लिए उसके पास अमेरिकन इंपीरियलिज्म, विश्व बैंक, ग्लोबलाइजेशन या ऐसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर लफ्फाजी के कुछ नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद यहीं चंद्रशेखर AISA से अलग थे। चंद्रशेखर ने केवल अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को ही नहीं समझा, स्थानीय मुद्दों को भी समझा और इन मुद्दों पर लोगों को अपने से जोड़ा। और इन मुद्दों पर लोगों को साथ लाने के बाद उन्हें देशी-विदेशी बातों से जोड़ा .. समझाया कि इन बातों को जानना क्यों उनके लिए जरूरी है। ऐसे भी जब तक हमारी दैनिक जरूरतें पूरी नहीं होतीं, हम साफ्ताहिक, मासिक या सालाना मुद्दों के बारे में नहीं सोचते.. राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के बारे में हम तभी सोचते हैं जब हमारी स्थानीय आवश्यकताएं पूरी हो जाएं। AISA के लोग, चंद्रशेखर के परवर्ती लोग ये नहीं कर सके। केवल चंद्रशेखर की दुहाई देते रहे, दारू के ग्लास भर-भर कर, आंखें लाल कर-कर के दुनिया-जहान के मुद्दों पर बहस करते रहे। और शायद इसीलिए चंद्रशेखर के बाद AISA जेएनयू में, अपने ही घर में नहीं टिक पायी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-5588471933746157904?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/5588471933746157904/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=5588471933746157904' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/5588471933746157904'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/5588471933746157904'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/10/blog-post_31.html' title='चंद्रशेखर, जेएनयू और आज की छात्र राजनीति'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-875924646737695654</id><published>2007-10-15T20:45:00.000+05:30</published><updated>2007-10-15T20:45:23.541+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया विमर्श'/><title type='text'>अथ श्री टीआरपी कथा</title><content type='html'>&lt;strong&gt;पहले जरा इन आंकड़ों को देखिये&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुंबई    1245&lt;br /&gt;दिल्ली    1186&lt;br /&gt;कोलकाता    881&lt;br /&gt;गुजरात    993&lt;br /&gt;उत्तर प्रदेश   1273&lt;br /&gt;महाराष्ट्र    1019&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंजाब, हरियाणा&lt;br /&gt;चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश&lt;br /&gt;(चारों एक साथ)   1165&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्य प्रदेश   722&lt;br /&gt;पश्चिम बंगाल   703&lt;br /&gt;राजस्थान    441&lt;br /&gt;उड़ीसा    342                                                                &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कुल    9970&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- ये आंकड़े बस ये बताने के लिए कि किन राज्यों में कितने डब्बे टीआरपी मापने के लिए हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- ये 9970 डब्बे लगभग 69 हजार लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं ( TAM के वैल्यू के हिसाब से)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- ये डब्बे सिर्फ और सिर्फ घरों में लगे हुए हैं ( किसी भी ऑफिस, होटल, रेस्तरां, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट या कहीं और नहीं)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- TAM की रेटिंग्स में सभी प्रकार के चैनलों की रेटिंग गिनी जाती है यानी सामान्य मनोरंजन चैनल्स, खेल चैनल्स, समाचार चैनल्स और लाइफ स्टाइल चैनल्स या कोई और भी होता हो तो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- TAM एक परिवार में चार सदस्यों को मानता है। सबके हिस्से में एक-एक बटन होता है.. जब जो टीवी देखे, अपने हिस्से का बटन दबा दे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- दक्षिणी, उत्तर-पूर्वी राज्यों और पश्चिम बंगाल को छोड़ कर जो हिस्सा बचता है, TAM उसे हिंदी भाषी मानता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- उड़ीसा, गुजरात, महाराष्ट्र और पंजाब को भी- दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद और बंगलोर महानगरों की श्रेणी में रखे गए हैं, पर हिंदी भाषी दिल्ली, मुंबई और कोलकाता को माना गया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- TAM के मुताबिक मुंबई हिंदी चैनल्स का सबसे बड़ा बाजार है, दूसरे पर दिल्ली और तीसरे पर कोलकाता आते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;- बिहार और उत्तर-पूर्वी राज्यों में एक भी डब्बे नहीं हैं &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;- TAM के हिसाब से बाजार के मामले में उत्तर प्रदेश और गुजरात तीसरे-चौथे स्थान पर हैं और हर हफ्ते ये स्थिति बदलती रहती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- TAM के मार्केट्स दो भागों में बंटे हैं - 1 लाख से 10 लाख वाले शहर / हिस्से और 10 लाख से ज्यादा के शहर (महानगर 10 लाख से ज्यादा वाले हिस्से में आते हैं और दो भागों में नहीं बंटे हैं लेकिन अन्य सभी राज्य दो भागों में बंटे हैं। इन्हीं की वजह से उत्तर प्रदेश और गुजरात के क्रम हर हफ्ते बदलते रहते हैं)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- TAM केवल केबल टीवी देखने वालों की गिनती करता है - दूरदर्शन देखने वाले और DTH के ग्राहक इसके दायरे से बाहर हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अब जरा गणना के तरीके पर आइए&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- TAM के मुताबिक उसका एक डब्बा पूरे मुहल्ले का प्रतिनिधित्व करता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- गणना के लिए आम तौर पर 15 से 45 साल के बीच के लोगों को ही रखा जाता है.. मतलब बटन भी ये ही दबा सकते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- गणना मिनट के हिसाब से की जाती है.. 'अ' ने 5 मिनट देखा, 'ब' ने 2 मिनट देखा,  'स' ने एक ही मिनट देखा और तब उस कार्यक्रम विशेष या टाइम स्लॉट की REACH निर्धारित की जाती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- ध्यान दीजिए कि गणना कार्यक्रम विशेष या टाइम स्लॉट की होती है, चैनल की नहीं- टीआरपी निर्धारित करने के लिए समय को मौटे तौर पर तीन हिस्से में बांटा गया है.. सुबह 8 बजे से 4 बजे दिन तक, 4 बजे से रात 12 बजे तक(प्राइम टाइम) और रात 12 बजे से सुबह के 8 बजे तक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- रेटिंग प्वाइंट्स में सबसे बड़ा खेल मिनट का होता है.. किसी कार्यक्रम को औसतन 5 मिनट देख लिया गया तो वो कार्यक्रम धन्य है.. मतलब उस कार्यक्रम की REACH इन्हीं मिनटों के हिसाब से तय होती है ( कि कितने लाख घरों तक उसकी REACH है) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- हर दिन की रेटिंग अलग-अलग होती है पर मोटे तौर पर ये तीन हिस्सों में होता है - सोमवार से शुक्रवार, शनिवार और रविवार- साप्ताहिक आंकड़े कैसे बनते हैं.. जिन पर चैनल्स शोर मचाते हैं कि वो नंबर 1 है या नंबर 2 हैं          &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;TAM का सॉफ्टवेयर हफ्ते भर की रेटिंग के लिए एक समय विशेष को चुनता है.. जैसे 7 बजे किस चैनल पर कितने लोग ट्यून्ड थे और इसके हिसाब से गिनती होती है। TAM का सॉफ्टवेयर हर हफ्ते RANDOMLY समय का चुनाव करता है .. मतलब इस हफ्ते 7 बजे तो अगले हफ्ते 10 बजे भी हो सकता है और उसके अगले हफ्ते 8:30 बजे भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- TAM के सॉफ्टवेयर के हिसाब से हर मिनट की गिनती संभव है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- TAM ये बता सकता है कि कितने बजे कितने लोग उसके डब्बे के बटन को दबाए हुए थे और उसके हिसाब से कितने लोग उस समय विशेष पर कौन सा चैनल देख रहे थे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अपनी बात&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1.   TAM का दावा है कि उसकी गणना वैज्ञानिक है और उसका सॉफ्टवेयर फूल-प्रूफ है। लेकिन क्या 9970 डब्बे 70-80 करोड़ (TAM का हिंदी भाषी क्षेत्र) लोगों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2. चलिए मान लिया कि ये केवल केबल टीवी देखने वालों की गणना है - मतलब शहरों में रहने वाला तबका। लेकिन क्या 9970 डब्बे या 69 हजार लोग (इन डब्बों की टोटल वैल्यू, TAM इसे यूनिवर्स कहता है) २.5-30 करोड़ की शहरी आबादी का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं या केबल टीवी देखने वाले 4-5 करोड़ घरों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3. TAM के रेटिंग में बिहार अनुपस्थित है, उत्तर प्रदेश तीसरे-चौथे नंबर के लिए संघर्ष करता रहता है, मध्य प्रदेश 8वें स्थान पर है, जबकि राजस्थान 10वें पायदान पर। ये हमारे हिंदी प्रदेश हैं और ये परंपरागत हिंदी भाषी लोग TAM की रेटिंग्स में बहुत नीचे हैं। क्या इसलिए कि इन राज्यों में शहरीकरण उतनी तेजी से नहीं हुआ जितनी तेजी गुजरात, महाराष्ट्र में देखी गयी ? लेकिन फिर भी ऐसे कई शहर इन राज्यों में हैं जो दस लाख से ज्यादा की आबादी वाले हैं । तो क्या ये प्रोडक्ट बेचने के लिए सक्षम बाजार नहीं हैं ? उत्तर मेरे पास नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4.  अब जरा हमारे हिंदी समाचार चैनलों पर आएं - ये सारे शोर मचाते हैं कि वो नंबर 1 तो वो नंबर 1 लेकिन TAM के 9970 डब्बे चैनल्स के सभी तबकों का प्रतिनिधित्व करते हैं - मनोरंजन, समाचार, खेल, सिनेमा, लाइफस्टाइल और गणना समय के हिसाब से होती है।        &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे कहने का मतलब ये है कि रेटिंग्स इस सच्चाई को बयान नहीं करते कि किस न्यूज चैनल की हकीकत क्या है क्योंकि साप्ताहिक रेटिंग समय विशेष के हिसाब से निकला जाता है और उसमें 'कितने मिनट देखा गया' का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है।        &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे ये भी कहना है कि न्यूज चैनल्स कुछ भी कह लें पर 9970 डब्बे ये भी बयान करते हैं कि कोई भी चैनल औसतन एक घंटा भी नहीं देखा जाता (चैनल्स की REACH यही बताती है और संपादक लोग इसी REACH पर मरते रहते हैं)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5.    इतने के बावजूद चैनल्स रेटिंग्स की मारामारी करते हैं क्योंकि यही उनका मार्केट परसेप्शन बनाता है और कितने विज्ञापन आएंगे ॥ मोटे तौर पर इसी से निर्घारित होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6. ये भी एक दिलचस्प बात है कि गंभीर खबरों को रेटिंग्स नहीं मिलती है और क्रिकेट, सिनेमा, क्राइम, मनोरंजन, भूत-प्रेत, नाग-नागिन जब दिखाए जाते हैं तो रेटिंग्स आती हैं। इस ट्रेंड को ज़ी न्यूज ने पकड़ा, आज तक ने एक नया आयाम दिया, स्टार न्यूज ने इसे और भी ऊंचाईयां दी और अब इंडिया टीवी के नाग-नागिन इसे पराकाष्ठा पर पहुंचा रहे हैं।           &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; हिंदी समाचार चैनलों की पत्रकारिता पर इसका क्या असर पड़ता है, इस पर हम सब कई बार बहस कर चुके। इसलिए उस ओर नहीं जाऊंगा लेकिन नाग-नागिन या भूत प्रेत लगातार इसीलिए दिखाए जा रहे हैं क्योंकि रेटिंग्स मिलती है। अब तो प्रतिस्पर्धा इस बात पर हो रही है कि किसका नागिन, किसका भूत सबसे बढ़िया ।           &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एनडीटीवी इंडिया को गंभीर चैनल माना जाता है लेकिन मेरी जानकारी के मुताबिक विज्ञापन के लिए उसे 24*7 के बुके में बेचा जाता है, ताकि मार्केटिंग होती रहे और कमाई भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;7. इस विश्लेषण की जो बात मुझे विचलित करती है -----              &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या हम सब बीमार, विकृत, थकी या सड़ी हुई मानसिकता के लोग हैं (इससे ज्यादा शब्द नहीं मिल रहे ) ? &lt;strong&gt;हम सब मतलब हम सब , हमारा शहरी वर्ग जो केबल टीवी देखता है (चाहे थोड़ी संख्या में ही)&lt;/strong&gt;। गौर कीजिए कि ये बुद्धू बक्से किसी भी ऑफिस में नहीं हैं, होटल में नहीं हैं, रेस्तरां में नहीं हैं, रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट पर नहीं हैं.. ये केवल और केवल घरों में हैं।           &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; क्या इसका मतलब है कि हम इतने विकृत हो चुके हैं कि अब नाग-नागिन, भूत-प्रेत हमें, हमारे घरों को ज्यादा लुभाते हैं (कम-से-कम रेटिंग्स तो यही कहती हैं) या फिर हम जिंदगी से इतना थक चुके हैं कि ये कार्यक्रम हमारे लिए दवा का काम करते हैं और वास्तविक दुनिया से अलग किसी और लोक में ले जाते हैं (जहां हम अपने ग़म को, दुख को थोड़ी देर के लिए ही सही पर भूल जाते हैं) ?             &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जबाव मेरे पास नहीं हैं पर TAM रेटिंग्स की परत उघाड़ने से ऐसे भयावह प्रश्न उभर कर आए हैं और जाहिर तौर पर मैं इन संभावनाओं से विचलित हूं।            &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रसंगवश समाचार चैनल्स की तर्ज पर नाग-नागिन अब मनोरंजन चैनल्स में भी घर बना रहे हैं ( देखिए ज़ीटीवी पर नागिन सीरियल)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            अंत में बस इतना ही कि इसे बयान करने के क्रम में कहीं कोई तथ्यात्मक गलती हुई हो तो जरूर बताएं। प्रतिक्रियाओं और आलोचनाओं के लिए तो पलकें बिछाए बैठा हूं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-875924646737695654?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/875924646737695654/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=875924646737695654' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/875924646737695654'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/875924646737695654'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/10/blog-post.html' title='अथ श्री टीआरपी कथा'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-7470695757378199275</id><published>2007-08-04T19:26:00.000+05:30</published><updated>2007-08-04T19:26:49.457+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया विमर्श'/><title type='text'>पत्रकार क्यों सरकार के खिलाफ लिखते हैं ?</title><content type='html'>हमारे &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/07/blog-post_31.html"&gt;एक बेनाम साथी&lt;/a&gt; को लगता है कि सरकार के खिलाफ इतनी रिपोर्टिंग राज्य से भरोसा उठाने की कोशिश है और निजी क्षेत्र के बारे में कोई नहीं लिखता। उन्होंने ये बात मोहल्ले को लिखी। असहमति के हर स्वर का स्वागत है। लेकिन उनके मत और मेरे मत में अंतर ये हैं कि उनके द्वारा दिए गए संदर्भों से मैं सहमत नहीं हूं। इसलिए मोहल्ले की गलियों में अपनी बात मैंने पहुंचाई। इसे यहां डालने तक &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/08/blog-post_4923.html"&gt;वो अपने जबाव &lt;/a&gt;के साथ भी हाजिर हैं और बहस को नया आयाम दे रहे हैं। उन्होंने अपनी बात शुरू की है कि हमारे सामने विकल्प सीमित हैं और अंत करते हैं कि हम सब अभिशप्त हैं इन्हीं दो (सीमित) विकल्पों में चुनाव के लिए। सच्ची बात है कि विकल्प सीमित हैं क्योंकि राजसत्ता और निजी क्षेत्र के बीच एक तीसरा तंत्र खड़ा करने की ईमानदार कोशिश का अभाव है, बहुत कुछ राजनीतिक पार्टियों के तीसरे मोर्चे की तरह। मेरी गुजारिश ये भी है कि कम-से-कम मुझे बाजार का प्रवक्ता न समझें, लेकिन अपनी समझ को रखने की इजाजत भी दें। डर लग रहा है कि ये हमारे-उनके निजी वाद-विवाद में बदल रहा है। किसी की समझ उसके बात की वकालत नहीं हो सकती। वो एक तटस्थ वक्तव्य भी हो सकता है। हालांकि मैं अपने को डिफेंड करने नहीं कर रहा, बल्कि मुझे लगता है कि हम सब अपनी बात अपने-अपने तरीके से कह रहे हैं। लेकिन हम सब सच में अभिशप्त हैं इन्हीं सीमित विकल्पों में चुनने के लिए..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लेकिन ये भी सच है कि सरकार राज्य को चलाता है या यूं कहें कि राज्य को चलाने का तंत्र सरकार के हाथ में है और बहुत हद तक सरकार राज्य का पूरक है। हालांकि पर्यायवाची नहीं है। यूं भी कह सकते हैं कि सरकार हमारे समय की सबसे बड़ी कंपनी है (यदि सबको बाजार के पैमाने पर तौलें तो)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/08/blog-post_02.html"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;बेनाम के नाम एक ख़त&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;प्रिय &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/07/blog-post_31.html"&gt;बेनाम मित्र&lt;/a&gt;,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;साक्षर और शिक्षित &lt;/strong&gt;की बहस में मैं नहीं जाऊंगा। देसी मीडिया पर हमारे समय की जो मेरी समझ है, वो मैंने रखने की कोशिश की थी। आपने कुछ बड़े महत्वपूर्ण सवाल उठाये हैं। मसलन राज्य से भरोसा उठाने की कोशिश वाली जो बात आप करते हैं, उसमें आपके द्वारा दिये गये संदर्भों से मैं सहमत नहीं हूं। डिस-इनवेस्टमेंट हो या खाद पर सब्सिडी या फॉरवर्ड ट्रेडिंग पर रोक- ज़रा सोचिए कि सरकारी उपक्रमों के विनिवेश की बात क्यों उठी? हमारे सरकारी तंत्र के काम करने की शैली ये है कि एक व्यक्ति 10 बजे ऑफिस पहुंचने के बदले 11 बजे आता है। लंच का समय यदि एक बजे शुरू होता है तो काम-काज 12 बजते-बजते बंद हो जाता है। लंच दो बजे ख़त्म होता है तो वो व्यक्ति ढाई-तीन बजे काम पर लौटता है और चार-साढे चार बजे तक एक्जिट मोड में आ जाता है। हमारे सरकारी तंत्र आज भी ऐसे ही चल रहे हैं और इसमें भ्रष्टाचार का पहलू भी जोड़ दीजिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो बात यही है कि हमारे सरकारी उपक्रम सफेद हाथी बन चुके हैं और हमारे-आपके पैसे का खुलेआम दुरूपयोग जारी है। खाद पर सब्सिडी किसानों को आज तक नहीं मिली, सत्ता तंत्र की वजह से कंपनियां पैसा पीटती रहीं (संदर्भवश आज ही यानी बुधवार को खाद मंत्री पासवान और उनके अधिकारियों ने फिर इस मांग को खारिज कर दिया कि किसानों को सब्सिडी सीधे दी जाय। उनका तर्क है कि इससे खाद पर सरकारी कंट्रोल खत्म हो जाएगा और दाम अनियंत्रित हो जाएंगे। ऐसे में, किसानों को सब्सिडी देने से अल्टीमेटली सरकार को ही पैसे चुकाने होंगे। उनके अनुमान के मुताबिक ये मौजूदा सब्सिडी से ज्यादा होगा। साथ ही, सरकार ये भी कहती है कि उसका अपना ही तंत्र ब्लॉक-अंचल स्तर पर इसमें बाधक बन जाएगा और किसानों की परेशानियां बढ़ जाएंगी)। फॉरवर्ड्स मार्केट की बात यदि करें, तो क्या एक अदना किसान यहां ट्रेडिंग कर सकता है? उनके नाम पर दरअसल बड़े व्यापारी और दलाल क्या कमाई नहीं कर रहे हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो सरकार/ सरकारी संस्था पर पत्रकार शायद इसलिए इतना लिखते हैं। हमारे 60 साल के शासन तंत्र ने हर छोटी-बड़ी बात के लिए हमें सरकारी की ओर आशाभरी दृष्टि से देखने की आदत लगा रखी है और इसलिए इनके ख़िलाफ इतना लिखा जाता रहा है कि काई कुछ तो हटे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्रकार शायद इसलिए भी लिखते हैं कि हमारे प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री आंकड़ों के साथ खेल कर हमें बताते रहते हैं कि हमने सिंचाई के लिए 20 हजार करोड़ रुपये ख़र्च किये, जबकि आज भी हम सिंचाई के लिए मॉनसून की ओर ही टकटकी लगाये रहते हैं। हम देख रहे होते हैं कि अमीर-ग़रीब, हैव्स-हैव्स नॉट के बीच की खाई लगातार बढ़ती ही जा रही है और सरकार के मुखिया 10 फीसदी की रफ्तार से विकास का दावा करते रहते हैं। जनता को फील गुड हो या नहीं, खुद फील गुड करते रहते हैं। महंगाई को नापने के जो मापदंड (थोक मूल्य सूचकांक और कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स) 1973-74 में ही बनाये गये थे और उस समय जिन्हें पैमाना बनाया गया वे ही आज भी चल रहे हैं। क्या हमारे ये भाग्य विधाता हमें आज भी फटा सुथन्ना पहने रखने को विवश नहीं कर रहे और घाव में नमक लगाते हैं कि राष्ट्रगीत भी गाओ। &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/07/blog-post_17.html"&gt;दिलीपजी के पहले राइट अप&lt;/a&gt; में इस ओर इशारा था, पर उस पर इतनी बहस ही नहीं हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राज्य पर हम भरोसा क्यों करें? राज्य एक समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, कल्याणकारी राज्य होने का दावा करता है पर शब्दों में गूंथी गयी बातों की माला आज भी संविधान की मूर्ति पर ही टिकी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रही बात निजी क्षेत्र पर लिखने के बारे में तो बात सही है कि हमारे मीडिया (प्रिंट और टीवी) में इसके ख़िलाफ लिखने की परंपरा अभी विकसित नहीं हुई है। केवल जब अलाने-फलाने लोन के रेट बढ़ जाते हैं या लोन की किस्त नहीं चुकाने पर बैंक के गुंडे धमकाने पहुंचते हैं, तभी ये ख़बरें छपती हैं। निजी क्षेत्र की पैरोकारी मैं भी नहीं करता पर इसके ख़िलाफ लिखने की शैली को अभी और विकसित होना है, ऐसा मानता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूं तो आज के वाम दलों की राजनीति से अक्सर असहमत रहता हूं पर अच्छा लगता है जब देखता हूं कि इनके प्रचंड विरोध के चलते ही एक आदमी की रिटायरमेंट की पूंजी (पी एफ और पेंशन) शेयर बाजार में इनवेस्ट नहीं हो पाती। भले ही वो रकम केवल 5 फीसदी ही क्यों न हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कॉरपोरेट और बाज़ार के बारे में मैं इतना फिर कहूंगा कि कॉरपोरेट बाज़ार का हिस्सा है और बाज़ार अपने आप में एक इंस्टीट्यूशन की शक्ल ले चुका है। हमारे समय के सबसे बुद्धिमान लोग इन कॉरपोरेट्स की मदद पर चौबीसों घंटे रहते हैं और लगातार बाज़ार की दिशा को परखते रहते हैं कि बाज़ार कहां और किधर जा रहा है, इसका भविष्य कहां है। उनके ही हिसाब से कॉरपोरेट्स अपने पैसे का निवेश करते हैं। ये बाज़ार के भविष्य को भांप सकते हैं और बाज़ार को उस और जाने को प्रेरित कर सकते हैं पर इसका पर्यायवाची नहीं हैं। यूं भी कह सकते हैं कि बाजार हमारे समय का बिग ब्रदर है ('बिग ब्रदर इज वाचिंग यू' टाइप से) और कॉरपोरेट्स इसकी सत्ता के सबसे मजबूत और समर्थ खिलाड़ी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्हीं कॉरपोरेट्स के एक अंग हमारे कल तक के प्रतिबद्ध पत्रकार और आज के मीडिया मुगल हैं। जब तक इनका हित सधेगा और मुनाफा होता रहेगा, रोज़ाना के कामों में हस्तक्षेप नहीं होगा। और चूंकि अभी तक हित सध रहा है, इसलिए हस्तक्षेप नहीं हो रहा है या कम हो रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/07/blog-post_30.html"&gt;चन्द्रिकाजी,&lt;/a&gt; आपकी बात सच है कि मीडिया पूरे देश में है, लेकिन हमारा मीडिया राजधानी दिल्ली में हुए एक बलात्कार को तो राष्ट्रीय ख़बर बना देता है पर जब तक नंदीग्राम में गोली नहीं चलती और कुछ लोग शहीद नहीं होते, वो राष्ट्रीय ख़बर नहीं बनती। लेकिन आज भी नई दुनिया या प्रभात खबर हमारे दिल्ली के अख़बारों/टीवी से ज़्यादा अच्छा काम रहे हैं। लेकिन स्थानीय टीवी मीडिया के बारे में ये नहीं कहा जा सकता। मजेदार तथ्य ये है कि टीवी की हाय-हाय इतना होने के बाद भी अखबारों की प्रसार संख्या घटी नहीं है... और भी बढ़ी ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जातिवाद, क्षेत्रवाद, चेलावाद पर इतना ही कहूंगा कि मेरी समझ में इन तीनों के खात्मे की घंटी कम-से-कम अभी तक तो नहीं बजी है और कोई आहट भी इनके जाने की नहीं सुनाई पड़ रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धन्यवाद&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-7470695757378199275?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/7470695757378199275/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=7470695757378199275' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/7470695757378199275'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/7470695757378199275'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/08/blog-post.html' title='पत्रकार क्यों सरकार के खिलाफ लिखते हैं ?'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-9218245452399061775</id><published>2007-07-28T21:11:00.000+05:30</published><updated>2007-07-28T21:11:44.951+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया विमर्श'/><title type='text'>मैं, मेरा समय और आज की पत्रकारिता</title><content type='html'>&lt;span style="color:#cc9933;"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;आज-कल हमारे मित्र अविनाशजी के मोहल्ले में एक गर्मा-गर्म बहस चल रही है हमारे समय की मीडिया, खास कर टीवी पत्रकारिता पर। आवाज के दिलीप मंडलजी ने मधुमक्खी के इस छत्ते को छेड़ा तो हम सब को इसका दंश लगा। कईयों ने लिखा है, मैंने भी कोशिश की है। तो नीचे लिखे गए उद्गार वही हैं, जो अविनाशजी के मोहल्ले की बहस पर लिखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;प्रिय अविनाशजी,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बधाई॥ काफी दिनों बाद मोहल्ले में एक अच्छी बहस शुरु हुई है। मीडिया विमर्श के इस मंथन में कुछ अच्छा निकलने और कुछ सार्थक होने की उम्मीद बंधती है। दिलीपजी ने मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ दिया है। अपनी बात उन्होंने ऐसी जगह ले जाकर छोड़ दी है कि कभी-कभी लगता है कि जैसे दुनिया लड़े-कटे और हम तमाशा देखें। हालांकि ये सच नहीं है। दिलीपजी और उनके बाद छपी कई और बातों ने लिखने के लिए मुझे भी उकसाया और वही आपको भेज रहा हूं। किसी की व्यक्तिगत आलोचना करने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। साथ ही, कई जगह मेरी बातों में विरोधाभास झलक सकता है और अपनी ही बातों का दुहराव दिख सकता है। इस पर मेरा कंट्रोल नहीं है। पर मुझे लगता है कि ये विरोधाभास न केवल हमारे समय के समाचार तंत्र में है, बल्कि हमारे समाज और हमारे व्यक्तित्व में भी है। हम कई मुखौटे ले कर चलते हैं और जरूरत के मुताबिक उसे लगा लेते हैं। इस बीच में अनामदासजी और एक गुमनाम की चिठ्ठी भी आपने छापी है। दोनों की भाषा काफी सधी हुई है और दोनों लगभग वही बात कहते हैं जो मैं आगे कहने जा रहा हूं अपनी बेलगाम भाषा में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी बात की शुरूआत दिलीपजी की चेलावाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद वाली बात से करता हूं। दिलीपजी कहते हैं कि पुराने दौर में जिस तरह का चेलावाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद था वो अब चल नहीं सकता। .... बाजार उसे एक हद से ज्यादा जातिवादी होने की इजाजत नहीं देगा। इस बात से मैं असहमत हूं। क्या दिलीपजी ईमानदारी से कह रहे हैं कि चेलावाद कम-से-कम टीवी न्यूज चैनल्स से खत्म हो गया या हो रहा है या उन्हें इसकी आहट सुनाई दे रही है..? जातिवाद और क्षेत्रवाद हो सकता है कि अपने आखिरी चरण में हो पर क्या चेलावाद खत्म हो रहा है ? हमारी समझ में तो ऐसा नहीं है बल्कि ये अभी और मुखर हो कर सामने आ रहा है। इसे पेटी के नीचे का प्रहार न समझा जाय लेकिन दिलीपजी, क्या आपने खुद कभी कोई ऐसी कोशिश की है कि खुद आपके चैनल में ही नियुक्तियों का एक ऐसा इंस्टीट्यूशन विकसित हो, जो इतनी पारदर्शी हो कि दूर से ही झलके और लोगों को शिकायत का मौका न मिले। चेलावाद फिलहाल अपने चरम पर है और सेंसेक्स की तर्ज पर नित नयी ऊंचाईयां चढ़ता ही दिख रहा है।&lt;br /&gt;सच्चाई ये है कि हम सब इस हम्माम में अपनी नंगई ढंकने से ज्यादा दूसरे की उघाड़ने में लगे रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं सत्येंद्रजी की इस बात से भी सहमत नहीं हूं कि हमारा समाचार तंत्र कॉरपोरेट मीडिया का रूप ले चुका है। कॉरपोरेट की जगह यदि बाजार का उपयोग करें तो बात बहुत हद तक सुलझती दिखती है, क्योंकि मोटे तौर पर आज भी कोई कॉरपोरेट हमारे चैनल्स या अखबार की सामान्य दिनचर्या में हस्तक्षेप नहीं करता है। बल्कि हमारे संपादक और बीते जमाने के प्रतिबद्ध पत्रकार आज के न्यू एज मीडिया मुगल होते जा रहे हैं। उनकी कंपनियां लिमिटेड कंपनी बन रही है और आज की नई दुनिया के अंबानी-मित्तल उसमें कुछ हिस्सा खरीदते जा रहे हैं (लेकिन तिमाही-छमाही-सालाना नतीजों के अलावा उनका कोई प्रत्यक्ष इंटरेस्ट आज भी नहीं दिखता है)। ये वही मीडिया मुगल हैं जो कल के प्रतिबद्ध पत्रकार थे और आज की नयी पीढ़ी को जिनके नाम की चाशनी हर लेक्चर के साथ पिलायी जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रतिबद्धता की बात करें तो हमारे आज के समाचार तंत्र में ये केवल इंडियन एक्सप्रेस और हिंदू में दिखती है। जनसत्ता के संपादकीय पन्नों के अलावा और क्या छपता है ये हम सब जानते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी समझ में हमारे समय का समाचार तंत्र (अखबार और खबरिया चैनल्स, दोनों) बहुत कुछ शेयर बाजार की तरह काम कर रहा है। ये हर दिन कुछ खबरें उछालता है, कुछ गिराता है। इसका सूचकांक आदमी की भावनाएं हैं, जिनसे ये खेलता है। ये दरअसल बाजार का लोकतंत्र है। ये हमारे टीवी समाचारों में भी दिखता है और अखबारों में भी। टीवी में ज्यादा हो सकता है पर क्या अखबार किसी खबर को नहीं उछालते और दूसरे-तीसरे-चौथे दिन उससे संबंधित खबरें पहले पन्ने पर नहीं छपतीं ? इन दूसरे-तीसरे-चौथे दिन की खबरों को गौर से जरा पढ़ें, क्या इनके पहले-दूसरे पैराग्राफ को छोड़ कर बाकी केवल बैकग्राउंड मैटीरियल नहीं होता ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीवी समाचारों की बात करें तो जाहिर-सी बात है कि बाजार का समाजशास्त्र इसके पीछे काम करता है। एक खबर को उछाला तो कई घंटे तक उछालते रहे औऱ फिर अगले दिन वो खबर कहां गयी, इसका कोई पता नहीं। निश्चित रूप से ये टीआरपी का खेल (जो खुद एक विवादित विषय है ॥ कि 1।15 अरब लोगों के देश के कुछ हजार लोगों का ही ये प्रतिनिधित्व करता है)। लेकिन इसी टीआरपी पर चलना संपादकों की मजबूरी भी है (इससे अच्छा विकल्प फिलहाल उनके पास नहीं है। डीटीएच के जरिए दर्शकों को नापने का मैकेनिज्म विकसित होने में अभी समय लगेगा), क्योंकि ये ही तय करता है कि चैनल्स को विज्ञापन कहां से मिलेंगे, पैसा कहां से आएगा। पर क्या ये सच नहीं है कि अखबार भी ऐसे ही नहीं हैं। नहीं तो क्यों अखबार पूरे पृष्ठों का विज्ञापन छापते हैं या क्यों पहले पन्ने का एक कोना विज्ञापन के लिए रिजर्व रखा जाता है। या फिर क्यों आईआरएस के नतीजे आने पर अखबार नंबर-1, नंबर-2 का शोर मचाते रहते हैं। ये बाजार का ही लोकतंत्र है कि हमारे समय के बिजनेस चैनल कंपनियों के चेयरमैन को प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद पहले अपने चैनल पर लाने के लिए लड़ते रहते हैं। यदि एक कंपनी का चेयरमैन एक बिजनेस चैनल पर पहले दिख गया तो दूसरा बिजनेस चैनल उस चेयरमैन का बायकॉट कर देता है क्योंकि दोनों चैनल्स जानते हैं कि चेयरमैन के पहली बार दिखने पर ही उस कंपनी का शेयर स्टॉक मार्केट में उछलेगा या गिरेगा। दूसरी बार में नहीं। दिलीपजी, आप भी इस बात से अवगत होंगे कि एक चेयरमैन या सीईओ यदि एनडीटीवी प्रॉफिट पर दिखता है तो सीएनबीसी और आवाज उसका बायकॉट कर देते हैं और अविनाशजी आपके लिए कि ठीक ऐसा ही एनडीटीवी प्रॉफिट भी करता है ... कि फील्ड में उस स्थान पर मौजूद चैनल्स के रिपोर्टर्स ऐसा सीन क्रिएट करते हैं कि एक भला आदमी वहां से हटने में ही भलाई समझता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रिंट और टीवी न्यूज की बात करें तो क्या ये नहीं है कि टीवी न्यूज में दिखाए जाने वाले क्रिकेट, सिनेमा, क्राइम और सेक्स अखबारों द्वारा शुरू की गयी परंपरा का विस्तार नहीं है। क्या अखबारों ने इसकी शुरूआत नहीं की ? अंग्रेजी अखबारों में शुरू हुआ ये सिलसिला क्या अब हिंदी अखबारों से अछूता रह गया है जहां रंगीन पन्नों में हीरोइनों, मॉडल्स की अधनंगी तस्वीरें प्रमुखता से छपतीं हैं। रवीशजी ने ठीक ही सवाल उठाया है(जो शायद उन्होंने अपने ब्लॉग में लिखा था) कि अखबारों में क्यों केवल लड़कियों की तस्वीरें ही छपती हैं ॥ बारिश हो तो भीगती लड़की, धूप हो तो छाते में लड़की ...। क्या ये खबरों को बेचने का तरीका नहीं है ? क्या टीवी में दिखने वाले अपराध, हिंसा, बलात्कार की खबरें अखबारों की ओरिजिनल पेज-तीन पर छपने वाले लूट-मार, हत्या, बलात्कार की खबरों का विस्तार नहीं है ? क्या अखबारों ने इस परंपरा की शुरूआत नहीं की थी या क्या अखबारों ने आज इसे प्रमुखता देना बंद कर दिया है ? कई स्थानीय अखबार तो आज भी इन्हीं की बदौलत चलते हैं और क्या इसकी वजह से ही राष्ट्रीय अखबारों ने अपने स्थानीय संस्करण को भी एक ही राज्य के भीतर कई टुकड़ों में नहीं तोड़ दिया ? क्या भूत-प्रेत की खबरें अखबारों के परिशिष्ट के आखिरी पन्नों पर आज भी प्रमुखता से नहीं छपतीं ? या क्या अखबारों ने खेल के पन्नों को केवल और केवल क्रिकेट की खबरों से नहीं रंगा ?  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंतर बस इतना है कि अखबार दिन में केवल एक बार छपते हैं, टीवी चौबीसों घंटे दिखता है। टीवी ज्यादा प्रभावी है क्योंकि दृश्य मीडियम है और विजुअल्स आंखों में अनजाने में भी समा ही जाते हैं॥ अखबारों की खबरों को कल्पना के जरिए साकार करना पड़ता है। पर क्या ये सभ्यता के विकास की चिरंतन परंपरा नहीं है जो आदिमानव से मानव और जंगल से शहर/महानगर तक लाती है ? तो रोना उस वक्त रोएं जब अखबार खुद पाक साफ हों। टीवी में स्थानीय खबरों की प्रमुखता भी अखबारों की ही देन है और राजधानी दिल्ली की छोटी खबरों को बड़ा बनाना भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां, ये जरूर है कि कई बार या अक्सर टीवी न्यूज अति की पराकाष्ठा पर पहुंच जाता है। लेकिन टीवी न्यूज चैनल्स भी वक्त के साथ बड़े हो रहे हैं और विकसित हो रहे हैं। लेकिन इसमें समय लगेगा। ये न्यूज चैनल्स के लिए ट्रांजीशन का दौर है॥ एक चोला उतार कर दूसरे को अपनाने की, उसमें समाने की तैयारी हो रही है। पर क्या ऐसा ही हमारे समाज के साथ नहीं है ? टीवी ने समाज को बदला है तो समाज ने टीवी को भी बदला है और दोनों एक-दूसरे को निरंतर बदल रहे हैं। जब ताली बजती है तो ये बताना मुश्किल होता है कि बांए हाथ का योगदान ज्यादा रहा या दाएं हाथ का। टीवी और समाज के साथ भी ऐसा ही है। ठेठ भाषा में कहें तो दूरदर्शन के दिनों को गिन कर ये टीवी समाचारों के गदह-पचीसी के दिन हैं और निजी चैनल्स के आने के समय से जोड़ें तो बचपना है। हम सब इसे बदलने को इतने साकांक्ष हैं पर हम सब में से किसी ने भी इस बदलाव के लिए अभी तक अपनी कोई योजना नहीं दी, अपना कोई मॉडल नहीं दिया है। हम सब केवल अतीत और एस पी को याद कर के स्यापा कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्यों न्यूज चैनल्स द्वारा किए जा रहे मीडिया ट्रायल्स को लोग देख रहे हैं या और बेशर्म हो कर कहें तो क्यों इन ट्रायल्स को टीआरपी मिल रही है ? (टीआरपी पर चाहे जितना विवाद हो, पर इसका मतलब है कि कुछ लोग तो इसे देख रहे हैं)। मैं इनकी पैरवी नहीं कर रहा लेकिन क्या ये हमारी न्याय व्यवस्था पर टिप्पणी नहीं है ? उम्र बीत जाती है, पीढ़ी-दर-पीढ़ी लगी रहती है कोर्ट केस को निपटाने में। ऐसे में, क्या मीडिया ट्रायल्स लोगों को एक विकल्प नहीं देते या थोड़ी देर के लिए ही सही पर खुशी नहीं देते ? हम सब डरते हैं पुलिस के पास जाने से कि कहीं हम ही न फंस जाएं और टीवी न्यूज चैनल्स लोगों के इसी भय को एक्सप्लॉइट कर रहे हैं। फिर भी लोग आ रहे हैं क्योंकि लोगों को एक इंस्टैंट जस्टिस की उम्मीद बंधती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीडिया ऑर्गनाइजेशन के भीतर की बात करें तो क्या वो सारी बातें अखबारों के दफ्तरों में नहीं होती जो टीवी चैनल्स के न्यूज रूम के भीतर होती है। अखबारों में छह बजे शाम से संस्करण निकलने तक की जो रोजाना का तरीका है, वो क्या चौबीसों घंटे चलने वाले न्यूज चैनल्स के न्यूज रूम से कितना अलग है ? क्या अखबारों में इंटर्न्स का शोषण नहीं होता ? कम या ज्यादा, ये तुलना करने का विषय हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिलीपजी ठीक कहते हैं कि जैसी पत्रकारिता अब होती है, वैसी पहले नहीं होती थी। अब ये हम पर है कि हम इसे किस तरह के चश्मे से देखते हैं। 50 साल पहले की बात करेंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी क्योंकि संदर्भ बदल गए हैं, परिभाषाएं बदल गयी हैं, मुहावरे बदल गए हैं और परिवेश बदल गया है। हमारा मीडिया हमारे समय का आईना है और हमारा समय हमारे मीडिया का आईना है। दोनों ही बातें सच हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बहस में पड़ने का कोई तुक नहीं है कि पत्रकारिता का स्वर्णकाल कब था या कब होगा ? वर्तमान में जीने की आदत हमें होनी चाहिए और वर्तमान ही हमारा स्वर्णकाल हो सकता है। 50 साल पहले की परिभाषाएं हमारे समय पर फिट नहीं बैठतीं। अपने समय के लिए परिभाषाएं हमें खुद गढ़नी होगी और ये ही हमारा स्वर्णकाल हो सकता है। अतीत का रोना रोते रहना विकल्प नहीं है। हमें वर्तमान में जीने की आदत होनी चाहिए और भविष्य के लिए रास्ता तैयार करना चाहिए। नहीं तो एह एकालाप करते रहेंगे, दुनिया आगे निकल जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये भी सत्य है कि हमारे समय की पीढ़ी, जिसे आप नयी पीढ़ी कह सकते हैं, वो आज मीडिया में, टीवी न्यूज में प्रतिबद्धता के लिए नहीं, नौकरी के लिए आती है। यहां हम मान कर चलते हैं कि हमें कम-से-कम 12-13 घंटे की नौकरी करनी है ताकि हम अपने लिए (किसी दूसरी नौकरी के माफिक ही) सुख-सुविधा के साधन जुटा सकें। टीवी में दिखना एक एडेड ग्लैमर है। न्यूज चैनल में काम करना हमारी पीढ़ी के लिए एक नौकरी ही है और यदि कोई किसी चीज के लिए प्रतिबद्ध है तो इस नौकरी से प्रतिबद्धता कहीं कम नहीं होती। यदि कोई कहता है कि वो टीवी में किसी प्रतिबद्घता के साथ, किसी मिशन के तहत आया है, तो वो या तो पथभ्रष्ट देवता है(जिसकी यहां जरुरत नहीं है) या फिर झूठ बोल रहा है। और आज नौकरी के हर क्षेत्र में कमोबेश ऐसी ही बात है। नहीं तो प्रतिबद्धता का ढोल पीटने वाले हजारों एनजीओज के बावजूद इस देश में केवल एक ही मेधा पाटकर, एक ही बाबा आम्टे, एक ही अन्ना हजारे, एक ही सुनीता नारायण, एक ही अरविंद केजरीवाल, एक ही एस पी सिंह और एक ही राजेंद्र माथुर क्यों उभर कर आते हैं ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज टीवी में काम करने के लिए आने वाली नयी पीढ़ी इस ग्लैमर के लिए आ रही है, जो उन्हें विद्यार्थी जीवन में दिखता है और जिसकी बदौलत वो रातों-रात दीपक चौरसिया या राजदीप सरदेसाई या रवीश कुमार बनने का सपना देखते हैं। फिर जब जमीनी सच्चाई का सामना करना पड़ता है, तो कोई उसमें से राह निकाल लेता है, कोई नियति मान कर स्वीकार कर लेता है, तो कोई भगोड़ा बन बैठता है। क्या ये सच नहीं है कि आज के बहुत-से पत्रकार इस दुनिया में उस वक्त आए, जब वो सरकारी नौकरी के लायक नहीं रहे और प्राइवेट सेक्टर ने उन्हें लिया नहीं.. मां-बाप से आंख मिलाने की हिम्मत नहीं रही तो कोई सेटिंग की, कोई कोर्स किया और पत्रकार बन गए। क्या ये चेलावाद का अप्रतिम नमूना नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब जो नयी पीढी पत्रकारिता जगत में आ रही है, उसके लिए ये केवल नौकरी है, जिसे वो कॉलेज से निकलने के बाद / कोर्स खत्म करने के बाद शुरू करता है। इस पीढी ने एस पी को नहीं देखा है और देखना भी नहीं चाहता है क्योंकि आज की पत्रकारिता में नियुक्ति की प्रक्रिया इतनी धुंधली है कि युवावस्था के जोश में जो भी थोड़े-बहुत सपने होते हैं या तथाकथित प्रतिबद्धता होती है, वो मिट्टी में मिल जाती है। इस पीढ़ी के पास एस पी की यादें या तो बिल्कुल नहीं हैं या फिर थोड़ी-बहुत धुंधली यादें हैं। इन धुंधली यादों में केवल इतना है कि एक दाढ़ी वाले शख्स थे, जो आधे घंटे के समाचार पढ़ते थे पर उनके तेवर तत्कालीन दूरदर्शनी समाचारों के तेवर से बिल्कुल अलग थे। वो मोनोटोनस नहीं थे, बोर नहीं करते थे। उनको केवल आधे घंटे देखने के बाद ये कसक उठती थी कि दूरदर्शनी/आकाशवाणी के समाचारों से अलग दिखने वाला ये शख्स और क्यों नहीं दिखता ? पर इसके पीछे के समाजशास्त्र से हमारी पीढ़ी को कोई लेना-देना नहीं रहा, ये तो बस भावनाओं की बात थी/है। और इसलिए हमारी पीढ़ी के लिए पत्रकारिता एक ऐसी नौकरी है, जिसमें कॉल सेंटर, प्राइवेट सेक्टर या सरकारी नौकरी से ज्यादा ग्लैमर है और रातों-रात प्रसिद्ध होने की संभावनाएं बहुत ज्यादा है। ये अलग बात है कि हकीकत का साक्षात्कार होते ही आधे लोग भाग खड़े होते हैं॥ कि ये करियर के तौर पर भी उतना ही डिमान्डिंग है, जितना कि एमबीए करके कोई नौकरी करना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं दिलीपजी की इस बात से भी असहमत हूं कि नया नायक या खलनायक कौन है, इसे दर्शकों का लोकतंत्र तय करता है। दर्शकों के च्वाइस की जो बात दिलीपजी करते हैं वो भी एक हद तक ही सही है। ये दर्शकों को रिजेक्ट करने की स्वतंत्रता भी नहीं दे रहा है और न ही अच्छा और गंदा देखने की च्वाइस। ये बाजार का लोकतंत्र है जो दर्शकों को मानों चार ऑप्शन दे रहा है कि इनमें से जो पसंद है उसे चुन लो पर चलेंगे इन्ही में से। दर्शक जब जिसे चाहे उसकी छुट्टी नहीं कर सकता। आपको बस इनमें से चुनने की स्वतंत्रता है। बाजार के इस लोकतंत्र में सभी चीजें तय हैं, आप जिसे चाहे चुन लें पर अपनी तरफ से कुछ नहीं जोड़ सकते। कभी जुड़ी भी तो वो नक्कारखाने में तूती की आवाज बन कर रह जाएगी और उसका मोल भी बाजार के लोकतंत्र में उतना ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोने से कोई हल नहीं निकलने वाला। टीवी न्यूज की अगंभीरता अखबारी खबरों का ही विस्तार है जो मौलिक पेज-तीन पर छपती रही हैं और जहां आज भी हिंसा-लूट-पाट-हत्या-बलात्कार की खबरों का ही वर्चस्व और बाहुल्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिद्धांत और आदर्श की बात करें तो क्या ईमानदारी से कोई बताएगा कि आजादी के बाद की अखबारी पत्रकारिता कितने सिद्धांतों, कितने आदर्शों पर चली और कितनी चाटुकारिता पर ? क्या मुख्यधारा के अखबारों का सत्ता तंत्र को समर्थन नहीं रहा या अखबारों ने दंगे भड़काने में योगदान नहीं दिया। आडवाणी की पहली रथ यात्रा के दौरान तो टीवी न्यूज के नाम पर बस दूरदर्शन था, फिर इतने लोग एक छद्म मंदिर के नाम पर कैसे भ्रमित कर दिए गए ? ये सरकारी रिपोर्ट ही है जो कहती है कि 2002 में गुजरात में दंगे भड़काने में सबसे बड़ा हाथ वहां के कुछ स्थानीय अखबारों की बायज्ड रिपोर्टिंग का था। टीवी मीडिया ने तो इसके खिलाफ इतना शोर मचाया कि संसद का विशेष सत्र वाजपेयीजी को बुलाना पड़ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो कहना यही है कि सब के अपने पक्ष और विपक्ष हैं और हम सब अपनी जरूरतों के मुताबिक तर्क गढ़ लेते हैं जो हमारे ईगो को संतोष पहुंचाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो कुल मिला कर ये ही है कि हमारे समय की पत्रकारिता हमारे ही समय का प्रतिनिधित्व करती है। जैसा समाज है, वैसी पत्रकारिता है और ये भी सच है कि पत्रकारिता का समाज पर यदि असर है तो समाज पर भी पत्रकारिता का खासा असर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो सच ये भी है कि टीवी पत्रकारिता अखबारी पत्रकारिता का ही एक्सटेंशन है और इसने अपने मानक, मॉडल सभी अखबारों से ही गढ़े हैं। ये अखबारों की ही अगली कड़ी है। इसने सब कुछ अखबार से ही उठाया और अब उसे एक नया आयाम दे रही है (गलत भी, सही भी)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो सच ये भी है कि     &lt;br /&gt;           ... टीवी पत्रकारिता का ये बचपन या कैशोर्यावस्था का दौर है और अभी इसे और विकसित होना है।     &lt;br /&gt;           ... इस पूत ने पालने में ही पैर दिखा दिए हैं    &lt;br /&gt;           ... पत्रकारिता के स्तर पर स्यापा करने से कुछ नहीं होने वाला, हम सब इस हम्माम में नंगे हैं     &lt;br /&gt;           ... एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने से कुछ नहीं मिलने वाला और न ही गलबहियां डाल कर रोने से परिदृश्य बदलने वाला है। या तो हम-आप-वो मिल कर इसे बदलने में लगें या फिर समय के अनुकूल बन कर अपना मुंह बंद रखें और तमाशा देखें।  च्वाइस हमारी होगी कि हम क्या करेंगे ?     &lt;br /&gt;           ... चेलावाद की अखबारी परंपरा टीवी न्यूज में उग्रतर होती जा रही है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और सच ये भी है कि हमारे समाचार तंत्र में आम आदमी कहीं नहीं है। ये तंत्र बाजार के लोकतंत्र से चलता है, जिसमें हमको-आपको चुनने के लिए कुछ ऑपशंस हैं, पर अलग से कुछ नया जोड़ने की इजाजत नहीं है। आपको इन्हीं में से पसंद और नापसंद करना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धन्यवाद।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-9218245452399061775?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/9218245452399061775/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=9218245452399061775' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/9218245452399061775'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/9218245452399061775'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/07/blog-post.html' title='मैं, मेरा समय और आज की पत्रकारिता'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-3202387061648415415</id><published>2007-06-16T19:24:00.000+05:30</published><updated>2007-06-16T19:24:15.287+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी पसंदीदा कविताएं'/><title type='text'>शहरोज़ की एक कविता</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#996633;"&gt;मुझे नहीं मालूम कि शहरोज़ कौन हैं, लेकिन कविता अच्छी लिखते हैं ( हालांकि उन्हें मेरे सर्टिफिकेट की जरुरत नहीं है) । ये कविता बीबीसी हिन्दी के साइट से उठायी है... अपनी-सी लगती है। कम शब्दों में इतने अच्छे से उस बात को कह गए हैं वो, जो शायद हमारी पीढ़ी की सबसे बड़ी इच्छा रही औऱ अब सबसे बड़ी पीड़ा है। &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;दिल्ली आकर&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;गाँव में थे&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;क़स्बे से आए व्यक्ति को&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;घूर-घूर कर देखते।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;क़स्बे में थे&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;शहर से आए उस रिक्शे के पीछे-पीछे भागते&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;जिस पर सिनेमा का पोस्टर चिपका होता।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;शहर में आए&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;महानगर का सपना देखते।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;दिल्ली आकर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;गाँव जाने का ख़ूब जी करता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;- शहरोज़&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;ई-11, सादतपुर,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;दिल्ली-110094&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-3202387061648415415?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/3202387061648415415/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=3202387061648415415' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/3202387061648415415'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/3202387061648415415'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/06/blog-post_16.html' title='शहरोज़ की एक कविता'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-7285683636003966864</id><published>2007-06-16T19:23:00.000+05:30</published><updated>2007-06-16T19:23:26.600+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपनी कविता'/><title type='text'>मैं, तुम और फिल्म</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000066;"&gt;यह मेरी अपनी कविता है ... खालिस अपनी । इसे लिखा तो कई वर्षों पहले था और पहली बार जब ब्लॉग की दुनिया से जुड़ा था तो इसे ही पोस्ट किया था । यह कविता आज भी &lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.hastakshep.multiply.com/"&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;www.hastakshep.multiply.com&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt; पर मौजूद है। यह अलग बात है कि उसकी कुंजी खुद भूल चूका हूँ । बहरहाल, इस ब्लॉग पर भी अपनी रचना के साथ पहली उपस्थिति इसी कविता के जरिये हो रही है। लेकिन यह महज एक संयोग से ज्यादा कुछ भी नहीं है क्योंकि इसे पुराने ब्लॉग से सीधे कट कर यहां पेस्ट कर रहा हूं। कविता लिखने के क्रम में ही एक बार ये भी लिखी गयी थी, दिल से में इसकी कोई विशेष जगह की बात बिल्कुल भी नहीं है। दिल से जुड़ीं कवितायेँ तो कुछ और ही हैं , जिसे फिर कभी पोस्ट करुंगा&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;मैं अमिताभ बच्चन नहीं हूं&lt;br /&gt;कि गाता चलूं&lt;br /&gt;" मैं और मेरी तन्हाई ॰॰॰"&lt;br /&gt;पर अपने एकाकी पलों में&lt;br /&gt;मैं भी कुछ ऐसा ही सोचता हूं&lt;br /&gt;चाहता हूं कि&lt;br /&gt;काश ! तुम मेरे पास होतीं&lt;br /&gt;मुझसे बातें करतीं&lt;br /&gt;और मैं तुम्हें निहारता रहता&lt;br /&gt;अपलक ॰॰॰॰॰&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्मी लग रहा है न मेरा अंदाज ?&lt;br /&gt;क्या करोगी&lt;br /&gt;आजकल सामान्य भारतीय&lt;br /&gt;सिनेमाई अंदाज में ही&lt;br /&gt;हंसता-गाता-रोता-जीता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा न&lt;br /&gt;मैं अमिताभ बच्चन नहीं हूं&lt;br /&gt;वो एंग्री यंगमैन था&lt;br /&gt;सारी दुनिया से लड़ कर अपनी प्रेमिका को पा सकता था,&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;मैं नहीं &lt;/span&gt;॰॰॰&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं दिलीप कुमार भी नहीं हूं कि&lt;br /&gt;गम में तुम्हारे&lt;br /&gt;टेसूए बहाता चलूं&lt;br /&gt;अरे॰॰ तुम नहीं तो कोई और सही&lt;br /&gt;वो भी नहीं तो&lt;br /&gt;कोई तीसरी सही ॰॰॰&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां, शाहरुख खान की एनर्जी और&lt;br /&gt;अगंभीरता&lt;br /&gt;मुझे प्रभावित करती है&lt;br /&gt;मैं भी वैसा ही बनना चाहता हूं&lt;br /&gt;ताकि विपरीत समय में भी हंसता रहूं&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;विषयांतर हो गया लगता है॰॰॰ नहीं ?&lt;br /&gt;कहां-कहां की बातें कर बैठा &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;पर क्या करूं ?&lt;br /&gt;जानता हूँ&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;कि तुम्हें पाने की कीमत देनी होगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पद-पैसा-प्रतिष्ठा के बिना आदमी का कोई मोल नहीं होता&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इसी 'प' अक्षर को पाने में लगा हूँ &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;इंतज़ार करो तब तक&lt;br /&gt;यदि कर सको तो ॰॰?&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-7285683636003966864?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/7285683636003966864/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=7285683636003966864' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/7285683636003966864'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/7285683636003966864'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/06/blog-post_15.html' title='मैं, तुम और फिल्म'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-1213973016719132609</id><published>2007-06-16T19:20:00.000+05:30</published><updated>2007-06-16T19:20:00.440+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी पसंदीदा कविताएं'/><title type='text'>ज्ञानेंद्रपति की तीन कविताएँ</title><content type='html'>&lt;span style="color:#6633ff;"&gt;&lt;em&gt;ज्ञानेंद्रपति की ये कविताएं बीबीसी हिन्दी के वेबसाइट पर पढ़ी थी। दिल में उतर गयी, उतरने लायक हैं भी। कम शब्दों में अपनी बात कहना एक बहुत बड़ी कला है और ये कविता इसका एक बढ़िया उदाहरण है। बहरहाल ज्ञानेंद्रपति से अपना कोई परिचय नहीं है, कवि और पाठक के रिश्ते के अलावा। बिना उनकी इजाजत के ये कविताएं यहां पोस्ट कर रहा हूं। क्षमा याचित है लेकिन मेरे इस विश्वास से शायद वो भी सहमत होंगे कि अच्छी चीजें लोगों तक पहुंचनी चाहिए। हालांकि इसका आर्थिक पक्ष ये है कि मुफ्त में ही क्यों ... पर ये एक अलग बहस है, जिस पर बात फिर कभी&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[ 1 ]&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्यों न क्यों न कुछ निराला लिखें&lt;br /&gt;इक नई देवमाला लिखें&lt;br /&gt;अंधेरे का राज चौतरफ़&lt;br /&gt;एक तीली उजाला लिखें&lt;br /&gt;सच का मुँह चूम कर&lt;br /&gt;झूठ का मुँह काला लिखें&lt;br /&gt;कला भूल, कविता कराला लिखें&lt;br /&gt;न आला लिखें, निराला लिखें&lt;br /&gt;अमरित की जगह विष-प्याला लिखें&lt;br /&gt;इक नई देवमाला लिखें&lt;br /&gt;खल पोतें दुन्या पर एक ही रंग&lt;br /&gt;हम बैनीआहपीनाला लिखें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;--# दुन्या - दुनिया&lt;br /&gt;#बैनीआहपीनाला - इंद्रधनुष के सात रंग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;***********************************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;हिंदी के लेखक के घर&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न हो नगदी कुछ ख़ास&lt;br /&gt;न हो बैंक बैलेंस भरोसेमंद&lt;br /&gt;हिंदी के लेखक के घर, लेकिन&lt;br /&gt;शाल-दुशालों का&lt;br /&gt;जमा हो ही जाता है ज़ख़ीरा&lt;br /&gt;सूखा-सूखी सम्मानित होने के अवसर आते ही रहते हैं&lt;br /&gt;(और कुछ नहीं तो हिंदी-दिवस के सालाना मौके पर ही)&lt;br /&gt;पुष्प-गुच्छ को आगे किए आते ही रहते हैं दुशाले&lt;br /&gt;महत्त्व-कातर महामहिम अंगुलियों से उढ़ाए जाते सश्रद्ध&lt;br /&gt;धीरे-धीरे कपड़ों की अलमारी में उठ आती है एक टेकरी दुशालों की&lt;br /&gt;हिंदी के लेखक के घर&lt;br /&gt;शिशिर की जड़ाती रात में&lt;br /&gt;जब लोगों को कनटोप पहनाती घूमती है शीतलहर&lt;br /&gt;शहर की सड़कों पर&lt;br /&gt;शून्य के आसपास गिर चुका होता है तापमान,&lt;br /&gt;मानवीयता के साथ मौसम का भी&lt;br /&gt;हाशिए की किकुड़ियाई अधनंगी ज़िंदगी के सामने से&lt;br /&gt;निकलता हुआ लौटता है लेखक&lt;br /&gt;सही-साबुत. और कंधों पर से नर्म-गर्म दुशाले को उतार,&lt;br /&gt;एहतियात से चपत&lt;br /&gt;दुशालों की उस टेकरी पर लिटाते हुए&lt;br /&gt;ख़ुद को ही कहता है&lt;br /&gt;मन-ही-मन&lt;br /&gt;हिंदी का लेखक&lt;br /&gt;कि वह अधपागल ‘निराला’ नहीं है बीते ज़माने का&lt;br /&gt;और उसकी ताईद में बज उठती है&lt;br /&gt;सेल-फ़ोन की घंटी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी छाती पर&lt;br /&gt;ग़रूर और ग्लानि के मिले-जुले&lt;br /&gt;अजीबोग़रीब&lt;br /&gt;एक लम्हे की दलदल से&lt;br /&gt;उसे उबारती हुई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;***********************************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;एक टूटता हुआ घर&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;एक टूटते हुए घर की चीख़ें&lt;br /&gt;दूर-दूर तक सुनी जाती हैं&lt;br /&gt;कान दिए लोग सुनते हैं.&lt;br /&gt;चेहरे पर कोफ़्त लपेटे&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नींद की गोलियाँ निगलने पर भी&lt;br /&gt;वह टूटता हुआ घर&lt;br /&gt;सारी-सारी रात जगता है&lt;br /&gt;और बहुत मद्धिम आवाज़ में कराहता है&lt;br /&gt;तब, नींद के नाम पर एक बधिरता फैली होती है ज़माने पर&lt;br /&gt;बस वह कराह बस्ती के तमाम अधबने मकानों में&lt;br /&gt;जज़्ब होती रहती है चुपचाप&lt;br /&gt;सुबह के पोचारे से पहले तक&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;****** ज्ञानेंद्रपति&lt;br /&gt;बी-3/12, अन्नपूर्णा नगर&lt;br /&gt;विद्यापीठ मार्ग&lt;br /&gt;वाराणसी-221002&lt;br /&gt;फोन-0542-2221039&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-1213973016719132609?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/1213973016719132609/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=1213973016719132609' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/1213973016719132609'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/1213973016719132609'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/06/blog-post_4317.html' title='ज्ञानेंद्रपति की तीन कविताएँ'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-6327005153959850357</id><published>2007-06-16T19:17:00.000+05:30</published><updated>2007-06-16T19:17:23.649+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी पसंदीदा कविताएं'/><title type='text'>हँसती रहने देना</title><content type='html'>&lt;strong&gt;बहुत सीधे-सपाट शब्दों में लिखी गयी ये कविता है, जो अज्ञेय की खासियत शायद नहीं है। अगर मैं गलत हूं तो हिन्दी वाले कृपया मुझे माफ करें। लेकिन पत्नी को इतना अच्छा संबोधन इतने कम शब्दों में .... एक बार तो पढ़ना लाजिमी है&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब आवे दिन&lt;br /&gt;तब देह बुझे या टूटे&lt;br /&gt;इन आँखों को हँसती रहने देना!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाथों ने बहुत अनर्थ किये&lt;br /&gt;पग ठौर-कुठौर चले&lt;br /&gt;मन के&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आगे भी खोटे लक्ष्य रहे&lt;br /&gt;वाणी ने (जाने अनजाने) सौ झूठ कहे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर आँखों ने&lt;br /&gt;हार, दुःख, अवसान, मृत्यु का &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;अँधकार भी देखा तो&lt;br /&gt;सच-सच देखा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पार&lt;br /&gt;उन्हें जब आवे दिन&lt;br /&gt;ले जावे&lt;br /&gt;पर उस पार&lt;br /&gt;उन्हें&lt;br /&gt;फिर भी आलोक कथा&lt;br /&gt;सच्ची कहने देना&lt;br /&gt;अपलक&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;हँसती रहने देना&lt;br /&gt;जब आवे दिन!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- अज्ञेय&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-6327005153959850357?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/6327005153959850357/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=6327005153959850357' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/6327005153959850357'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/6327005153959850357'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/06/blog-post_4011.html' title='हँसती रहने देना'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-5178382259381743542</id><published>2007-06-16T19:16:00.000+05:30</published><updated>2007-06-16T19:16:45.396+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी पसंदीदा कविताएं'/><title type='text'>यह दीप अकेला</title><content type='html'>&lt;strong&gt;अज्ञेय की इस कविता के कृपया बोल्ड किए हुए अंश देखें। प्रेरित करता है कुछ करते रहने को ... ठीक 'एकला चलो रे' के माफिक&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह दीप अकेला स्नेह भरा&lt;br /&gt;है गर्व भरा मदमाता&lt;br /&gt;पर इसको भी पंक्ति को दे दो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह जन है : गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गायेगा&lt;br /&gt;पनडुब्बा : ये मोती सच्चे फिर कौन कृति लायेगा?&lt;br /&gt;यह समिधा : ऐसी आग हठीला बिरला सुलगायेगा&lt;br /&gt;यह अद्वितीय : यह मेरा : यह मैं स्वयं विसर्जित :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह दीप अकेला स्नेह भरा&lt;br /&gt;है गर्व भरा मदमाता पर&lt;br /&gt;इस को भी पंक्ति दे दो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह मधु है : स्वयं काल की मौना का युगसंचय&lt;br /&gt;यह गोरसः जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय&lt;br /&gt;यह अंकुर : फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय&lt;br /&gt;यह प्रकृत, स्वयम्भू, ब्रह्म, अयुतः&lt;br /&gt;इस को भी शक्ति को दे दो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह दीप अकेला स्नेह भरा&lt;br /&gt;है गर्व भरा मदमाता पर&lt;br /&gt;इस को भी पंक्ति दे दो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा,&lt;br /&gt;वह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा,&lt;br /&gt;कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुँधुआते कड़वे तम में&lt;br /&gt;यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र,&lt;br /&gt;उल्लम्ब-बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय&lt;br /&gt;इस को भक्ति को दे दो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह दीप अकेला स्नेह भरा&lt;br /&gt;है गर्व भरा मदमाता पर&lt;br /&gt;इस को भी पंक्ति दे दो&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;- अज्ञेय&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-5178382259381743542?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/5178382259381743542/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=5178382259381743542' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/5178382259381743542'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/5178382259381743542'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/06/blog-post_6248.html' title='यह दीप अकेला'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-3205497551252493980</id><published>2007-06-16T19:15:00.001+05:30</published><updated>2007-06-16T19:15:54.703+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी पसंदीदा कविताएं'/><title type='text'>ब्राह्म मुहूर्त</title><content type='html'>&lt;strong&gt;पिताजी अक्सर ये कविता सुनाते थे ... औऱ अनकहे ही बहुत सारी बातें कह जाते थे । उनकी आकांक्षाएं, पीड़ा, वेदना ... सब सिर-माथे। इस की पंक्तियां तो लगता है जैसे कि दिमाग में चित्रित हैं। शायद उनसे न सुनता तो अर्थ कुछ दूसरे होते या देर से समझ आते। मेरी सर्वकालिक पसंदीदा कविताओं में से एक &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;जियो उस प्यार में &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;जो मैने तुम्हें दिया है&lt;br /&gt;उस दुख में नहीं&lt;br /&gt;जिसे बेझिझक मैंने पिया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस गान में जियो&lt;br /&gt;जो मैंने तुम्हें सुनाया है&lt;br /&gt;उस आह में नहीं&lt;br /&gt;जिसे मैंने तुम से छिपाया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस द्वार से गुज़रो&lt;br /&gt;जो मैंने तुम्हारे लिये खोला है&lt;br /&gt;उस अंधकार के लिये नहीं&lt;br /&gt;जिसकी गहराई को बार-बार&lt;br /&gt;मैंने तुम्हारी रक्षा की &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;भावना से टटोला है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह छादन तुम्हारा घर हो&lt;br /&gt;जिसे मैं असीसों से बुनता हूँ, बुनूँगा&lt;br /&gt;वे काँटे गोखरू तो मेरे हैं&lt;br /&gt;जिन्हें मैं राह से चुनता हूँ, चुनूँगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह पथ तुम्हारा हो&lt;br /&gt;जिसे मैं तुम्हारे लिये बनाता हूँ बनाता रहूँगा&lt;br /&gt;मैं जो रोड़ा हूँ उसे हथौड़े से तोड़ तोड़&lt;br /&gt;मैं जो कारीगर हूँ करीने से&lt;br /&gt;सँवारता सजाता हूँ, सजाता रहूंगा&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सागर के किनारे तक&lt;br /&gt;तुम्हें पहुँचाने का &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;उदार उद्यम ही मेरा हो&lt;br /&gt;फिर वहाँ जो लहर हो तारा हो&lt;br /&gt;सोन तरी हो अरुण सवेरा हो&lt;br /&gt;वह सब ओ मेरे वर्य!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारा हो, तुम्हारा हो, तुम्हारा हो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- अज्ञेय&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-3205497551252493980?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/3205497551252493980/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=3205497551252493980' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/3205497551252493980'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/3205497551252493980'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/06/blog-post_5744.html' title='ब्राह्म मुहूर्त'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-4642803723350463774</id><published>2007-06-16T19:15:00.000+05:30</published><updated>2007-06-16T19:15:05.159+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी पसंदीदा कविताएं'/><title type='text'>नया कवि : आत्म-स्वीकार</title><content type='html'>&lt;strong&gt;ये कविता बहुत हद तक मेरे ही जैसों के लिए है, जो उभरना चाहते हैं, खुशफहमी में रहते हैं... वगैरह-वगैरह । ईमानदारी से ये मेरे लिए ही है&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी का सत्य था,&lt;br /&gt;मैंने संदर्भ में जोड़ दिया ।&lt;br /&gt;कोई मधुकोष काट लाया था,&lt;br /&gt;मैंने निचोड़ लिया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी की उक्ति में गरिमा थी&lt;br /&gt;मैंने उसे थोड़ा-सा संवार दिया,&lt;br /&gt;किसी की संवेदना में आग का-सा ताप था&lt;br /&gt;मैंने दूर हटते-हटते उसे धिक्कार दिया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई हुनरमन्द था:&lt;br /&gt;मैंने देखा और कहा, 'यों!&lt;br /&gt;'थका भारवाही पाया -&lt;br /&gt;घुड़का या कोंच दिया, 'क्यों!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी की पौध थी,&lt;br /&gt;मैंने सींची और बढ़ने पर अपना ली।&lt;br /&gt;किसी की लगाई लता थी,&lt;br /&gt;मैंने दो बल्ली गाड़ उसी पर छवा ली ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी की कली थी&lt;br /&gt;मैंने अनदेखे में बीन ली,&lt;br /&gt;किसी की बात थी&lt;br /&gt;मैंने मुँह से छीन ली ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यों मैं कवि हूँ, आधुनिक हूँ, नया हूँ:&lt;br /&gt;काव्य-तत्त्व की खोज में कहाँ नहीं गया हूँ ?&lt;br /&gt;चाहता हूँ आप मुझे&lt;br /&gt;एक-एक शब्द पर सराहते हुए पढ़ें ।&lt;br /&gt;पर प्रतिमा--अरे, वह तो&lt;br /&gt;जैसी आप को रुचे आप स्वयं गढ़ें ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- अज्ञेय&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-4642803723350463774?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/4642803723350463774/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=4642803723350463774' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/4642803723350463774'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/4642803723350463774'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/06/blog-post_65.html' title='नया कवि : आत्म-स्वीकार'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-6915488056302903987</id><published>2007-06-16T19:14:00.000+05:30</published><updated>2007-06-16T19:14:32.722+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी पसंदीदा कविताएं'/><title type='text'>उड़ चल हारिल</title><content type='html'>&lt;strong&gt;अज्ञेय की कुछ रचनाएं मेरी 'ऑल टाइम फेवरिट' है औऱ ये कविता उन्हीं में से एक है &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उड़ चल हारिल लिये हाथ में&lt;br /&gt;यही अकेला ओछा तिनका&lt;br /&gt;उषा जाग उठी प्राची में&lt;br /&gt;कैसी बाट, भरोसा किन का!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शक्ति रहे तेरे हाथों में&lt;br /&gt;छूट न जाय यह चाह सृजन की&lt;br /&gt;शक्ति रहे तेरे हाथों में&lt;br /&gt;रुक न जाय यह गति जीवन की!&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;ऊपर ऊपर ऊपर ऊपर&lt;br /&gt;बढ़ा चीरता चल दिग्मण्डल&lt;br /&gt;अनथक पंखों की चोटों से&lt;br /&gt;नभ में एक मचा दे हलचल!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तिनका तेरे हाथों में है&lt;br /&gt;अमर एक रचना का साधन&lt;br /&gt;तिनका तेरे पंजे में है&lt;br /&gt;विधना के प्राणों का स्पंदन!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काँप न यद्यपि दसों दिशा में&lt;br /&gt;तुझे शून्य नभ घेर रहा है&lt;br /&gt;रुक न यद्यपि उपहास जगत का&lt;br /&gt;तुझको पथ से हेर रहा है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तू मिट्टी था, किन्तु आज मिट्टी को&lt;br /&gt;तूने बाँध लिया है&lt;br /&gt;तू था सृष्टि किन्तु सृष्टा का गुर&lt;br /&gt;तूने पहचान लिया है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिट्टी निश्चय है यथार्थ पर&lt;br /&gt;क्या जीवन केवल मिट्टी है?&lt;br /&gt;तू मिट्टी, पर मिट्टी से&lt;br /&gt;उठने की इच्छा किसने दी है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज उसी ऊर्ध्वंग ज्वाल का&lt;br /&gt;तू है दुर्निवार हरकारा&lt;br /&gt;दृढ़ ध्वज दण्ड बना यह तिनका&lt;br /&gt;सूने पथ का एक सहारा!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिट्टी से जो छीन लिया है&lt;br /&gt;वह तज देना धर्म नहीं है&lt;br /&gt;जीवन साधन की अवहेला&lt;br /&gt;कर्मवीर का कर्म नहीं है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तिनका पथ की धूल स्वयं तू&lt;br /&gt;है अनंत की पावन धूली&lt;br /&gt;किन्तु आज तूने नभ पथ में&lt;br /&gt;क्षण में बद्ध अमरता छू ली!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊषा जाग उठी प्राची में&lt;br /&gt;आवाहन यह नूतन दिन का&lt;br /&gt;उड़ चल हारिल लिये हाथ में&lt;br /&gt;एक अकेला पावन तिनका!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- अज्ञेय&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-6915488056302903987?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/6915488056302903987/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=6915488056302903987' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/6915488056302903987'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/6915488056302903987'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/06/blog-post_8261.html' title='उड़ चल हारिल'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-2059959492122359667</id><published>2007-06-16T19:13:00.000+05:30</published><updated>2007-06-16T19:13:50.838+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी पसंदीदा कविताएं'/><title type='text'>दुष्यन्त की शाइरी - 1</title><content type='html'>इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,&lt;br /&gt;नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,&lt;br /&gt;इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,&lt;br /&gt;आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,&lt;br /&gt;यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,&lt;br /&gt;पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,&lt;br /&gt;और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- दुष्यन्त कुमार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-2059959492122359667?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/2059959492122359667/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=2059959492122359667' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/2059959492122359667'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/2059959492122359667'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/06/1.html' title='दुष्यन्त की शाइरी - 1'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-8059281689730142217</id><published>2007-06-16T19:08:00.000+05:30</published><updated>2007-06-16T19:08:18.242+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी पसंदीदा कविताएं'/><title type='text'>दुष्यन्त की शाइरी - 2</title><content type='html'>हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,&lt;br /&gt;इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,&lt;br /&gt;शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,&lt;br /&gt;हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,&lt;br /&gt;सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,&lt;br /&gt;हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- दुष्यन्त कुमार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-8059281689730142217?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/8059281689730142217/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=8059281689730142217' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/8059281689730142217'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/8059281689730142217'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/06/2.html' title='दुष्यन्त की शाइरी - 2'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-1441931218329036165</id><published>2007-06-16T19:01:00.000+05:30</published><updated>2007-06-16T19:01:24.520+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी पसंदीदा कविताएं'/><title type='text'>एक आशीर्वाद / दुष्यन्त कुमार की कविता</title><content type='html'>जा तेरे स्वप्न बड़े हों।&lt;br /&gt;भावना की गोद से उतर कर&lt;br /&gt;जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें।&lt;br /&gt;चाँद-तारों सी अप्राप्य ऊचाँइयों के लिये&lt;br /&gt;रूठना-मचलना सीखें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हँसें&lt;br /&gt;मुस्कुराऐं&lt;br /&gt;गाऐं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर दीये की रोशनी देखकर ललचायें&lt;br /&gt;उँगली जलायें।&lt;br /&gt;अपने पाँव पर खड़े हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जा तेरे स्वप्न बड़े हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- दुष्यन्त कुमार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-1441931218329036165?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/1441931218329036165/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=1441931218329036165' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/1441931218329036165'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/1441931218329036165'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/06/blog-post.html' title='एक आशीर्वाद / दुष्यन्त कुमार की कविता'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-846960548667174430</id><published>2007-06-12T22:28:00.000+05:30</published><updated>2007-06-12T22:28:08.228+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कनुप्रिया'/><title type='text'>आम्र-बौर का गीत</title><content type='html'>&lt;em&gt;&lt;strong&gt;क्या आपने कनुप्रिया पढ़ी है। कनु यानी कृष्ण की प्रिया कनुप्रिया या राधा। पसंद आपकी। लेकिन इन पंक्तियों को जरा पढ़ें। प्रेम की एक नई परिभाषा धर्मवीर भारती कनुप्रिया के जरिए देते हैं। इसका एक और अंश 'तुम मेरे कौन हो कनु' भी जल्दी ही पोस्ट करूंगा। &lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यह जो मैं कभी-कभी चरम साक्षात्कार के क्षणों में&lt;br /&gt;बिलकुल जड़ और निस्पन्द हो जाती हूँ&lt;br /&gt;इस का मर्म तुम समझते क्यों नहीं मेरे साँवरे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारी जन्म-जन्मान्तर की रहस्य्मयी लीला की एकान्त संगिनी मैं&lt;br /&gt;इन क्षणों में अकस्मात&lt;br /&gt;तुम से पृथक नहीं हो जाती हूँ मेरे प्राण,&lt;br /&gt;तुम यह क्यों नहीं समझ पाते&lt;br /&gt;कि लाज&lt;br /&gt;सिर्फ जिस्म की नहीं होती&lt;br /&gt;मन की भी होती है&lt;br /&gt;एक मधुर भय&lt;br /&gt;एक अनजाना संशय,&lt;br /&gt;एक आग्रह भरा गोपन,&lt;br /&gt;एक निर्व्याख्या वेदना,&lt;br /&gt;उदासी,&lt;br /&gt;जो मुझे बार-बार चरम सुख के क्षणों में भी&lt;br /&gt;अभिभूत कर लेती है।&lt;br /&gt;भय,&lt;br /&gt;संशय,&lt;br /&gt;गोपन,&lt;br /&gt;उदासी&lt;br /&gt;ये सभी ढीठ, चंचल, सरचढ़ी सहेलियों की तरह&lt;br /&gt;मुझे घेर लेती हैं,&lt;br /&gt;और मैं कितना चाह कर भी&lt;br /&gt;तुम्हारे पास ठीक उसी समय&lt;br /&gt;नहीं पहुँच पाती जब आम्र मंजरियों के नीचे&lt;br /&gt;अपनी बाँसुरी में मेरा नाम भर कर तुम बुलाते हो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन तुम उस बौर लदे आम की&lt;br /&gt;झुकी डालियों से टिके कितनी देर मुझे वंशी से टेरते रहे&lt;br /&gt;ढलते सूरज की उदास काँपती किरणें&lt;br /&gt;तुम्हारे माथे मे मोरपंखों से बेबस विदा माँगने लगीं&lt;br /&gt;-मैं नहीं आयी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गायें कुछ क्षण तुम्हें अपनी भोली आँखों से&lt;br /&gt;मुँह उठाये देखती रहीं और फिर&lt;br /&gt;धीरे-धीरे नन्दगाँव की पगडण्डी पर&lt;br /&gt;बिना तुम्हारे अपने-आप मुड़ गयीं&lt;br /&gt;-मैं नहीं आयी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यमुना के घाट पर&lt;br /&gt;मछुओं ने अपनी नावें बाँध दीं&lt;br /&gt;और&lt;br /&gt;कन्धों पर पतवारें रख चले गये&lt;br /&gt;-मैं नहीं आयी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम ने वंशी होठों से हटा ली थी&lt;br /&gt;और उदास, मौन, तुम आम्र-वृक्ष की जड़ों से टिक कर&lt;br /&gt;बैठ गये थे&lt;br /&gt;और बैठे रहे, बैठे रहे, बैठे रहे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- मैं नहीं आयी, नहीं आयी, नहीं आयी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम अन्त में उठे&lt;br /&gt;एक झुकी डाल पर खिला एक बौर तुम ने तोड़ा&lt;br /&gt;और धीरे-धीरे चल दिये&lt;br /&gt;अनमने तुम्हारे पाँव पगडण्डी पर चल रहे थे&lt;br /&gt;पर जानते हो तुम्हारे अनजान में ही तुम्हारी उँगलियाँ&lt;br /&gt;क्या कर रही थीं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे उस आम्र मंजरी को चूर-चूर कर&lt;br /&gt;श्यामल वनघासों में बिछी उस&lt;br /&gt;माँग-सी उजली पगडण्डी पर&lt;br /&gt;बिखेर रही थीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.....यह तुमने क्या किया प्रिय!&lt;br /&gt;क्या अपने अनजाने में ही&lt;br /&gt;उस आम के बौर से&lt;br /&gt;मेरी क्वाँरी उजली पवित्र माँग&lt;br /&gt;भर रहे थे साँवरे?&lt;br /&gt;पर मुझे देखो कि मैं&lt;br /&gt;उस समय भी तो माथा नीचा कर&lt;br /&gt;इस अलौकिक सुहाग से प्रदीप्त हो कर&lt;br /&gt;माथे पर पल्ला डाल कर&lt;br /&gt;झुक कर तुम्हारी चरणधूलि ले कर&lt;br /&gt;तुम्हें प्रणाम करने&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- नहीं आयी, नहीं आयी, नहीं आयी!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;**&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर मेरे प्राण&lt;br /&gt;यह क्यों भूल जाते हो कि मैं वही&lt;br /&gt;बावली लड़की हूँ न जो - कदम्ब के नीचे बैठ कर&lt;br /&gt;जब तुम पोई की जंगली लतरों के पके फलों को&lt;br /&gt;तोड़ कर, मसल कर, उन की लाली से मेरे पाँव को&lt;br /&gt;महावर रचने के लिए अपनी गोद में रखते हो&lt;br /&gt;तो मैं लाज से धनुष की तरह दोहरी हो जाती हूँ&lt;br /&gt;अपनी दोनों बाँहों में अपने घुटने कस&lt;br /&gt;मुँह फेर कर निश्चल बैठ जाती हूँ&lt;br /&gt;पर शाम को जब घर आती हूँ तो&lt;br /&gt;निभॄत एकान्त में दीपक के मन्द आलोक में&lt;br /&gt;अपनी उन्हीं चरणों को&lt;br /&gt;अपलक निहारती हूँ&lt;br /&gt;बावली-सी उन्हें बार-बार प्यार करती हूँ&lt;br /&gt;जल्दी-जल्दी में अधबनी महावर की रेखाओं को&lt;br /&gt;चारों ओर देख कर धीमे-से&lt;br /&gt;चूम लेती हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;***&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात गहरा आयी है&lt;br /&gt;और तुम चले गये हो&lt;br /&gt;और मैं कितनी देर तक बाँह से&lt;br /&gt;उसी आम्र डाली को घेरे चुपचाप रोती रही हूँ&lt;br /&gt;जिस पर टिक कर तुम मेरी प्रतीक्षा करते हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और मैं लौट रही हूँ,&lt;br /&gt;हताश,&lt;br /&gt;और निष्फल&lt;br /&gt;और ये आम के बौर के कण-कण&lt;br /&gt;मेरे पाँव मे बुरी तरह साल रहे हैं।&lt;br /&gt;पर तुम्हें यह कौन बतायेगा साँवरे&lt;br /&gt;कि देर ही में सही&lt;br /&gt;पर मैं तुम्हारे पुकारने पर आ तो गयी&lt;br /&gt;और माँग-सी उजली पगडण्डी पर बिखरे&lt;br /&gt;ये मंजरी-कण भी अगर मेरे चरणों में गड़ते हैं तो&lt;br /&gt;इसी लिए न कि इतना लम्बा रास्ता&lt;br /&gt;कितनी जल्दी-जल्दी पार कर मुझे आना पड़ा है&lt;br /&gt;और काँटों और काँकरियों से&lt;br /&gt;मेरे पाँव किस बुरी तरह घायल हो गये हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कैसे बताऊँ तुम्हें&lt;br /&gt;कि चरम साक्षात्कार के ये अनूठे क्षण भी&lt;br /&gt;जो कभी-कभी मेरे हाथ से छूट जाते हैं&lt;br /&gt;तुम्हारी मर्म-पुकार जो कभी-कभी मैं नहीं सुन पाती&lt;br /&gt;तुम्हारी भेंट का अर्थ जो नहीं समझ पाती&lt;br /&gt;तो मेरे साँवरे -लाज मन की भी होती है&lt;br /&gt;एक अज्ञात भय,&lt;br /&gt;अपरिचित संशय,&lt;br /&gt;आग्रह भरा गोपन,&lt;br /&gt;और सुख के क्षणमें भी&lt;br /&gt;घिर आने वाली निर्व्याख्या उदासी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-फिर भी उसे चीर कर&lt;br /&gt;देर में ही आऊँगी प्राण,&lt;br /&gt;तो क्या तुम मुझे अपनी लम्बी&lt;br /&gt;चन्दन-बाहों में भर कर बेसुध नहीं&lt;br /&gt;कर दोगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- धर्मवीर भारती&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-846960548667174430?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/846960548667174430/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3467787994669961572&amp;postID=846960548667174430' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/846960548667174430'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3467787994669961572/posts/default/846960548667174430'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baatbolegi.blogspot.com/2007/06/blog-post_09.html' title='आम्र-बौर का गीत'/><author><name>Amit Anand</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04290759395722079635</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3467787994669961572.post-5056233463830949166</id><published>2007-06-12T22:24:00.000+05:30</published><updated>2007-06-12T22:24:32.759+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कनुप्रिया'/><title type='text'>समापन</title><content type='html'>क्या तुम ने उस वेला मुझे बुलाया था कनु?&lt;br /&gt;लो, मैं सब छोड़-छाड़ कर आ गयी!&lt;br /&gt;         &lt;br /&gt;          इसी लिए तब&lt;br /&gt;          मैं तुम में बूँद की तरह विलीन नहीं हुई थी,&lt;br /&gt;          इसी लिए मैं ने अस्वीकार कर दिया था&lt;br /&gt;          तुम्हारे गोलोक का&lt;br /&gt;          कालावधिहीन रास,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          क्योंकि मुझे फिर आना था!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम ने मुझे पुकारा था न&lt;br /&gt;मैं आ गयी हूँ कनु!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          और जन्मान्तरों की अनन्त पगडण्डी के&lt;br /&gt;          कठिनतम मोड़ पर खड़ी हो कर&lt;br /&gt;          तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ।&lt;br /&gt;          कि इस बार इतिहास बनाते समय&lt;br /&gt;          तुम अकेले न छूट जाओ!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुनो मेरे प्यार!&lt;br /&gt;प्रगाढ़ केलिक्षणों में अपनी अन्तरंगसखी को&lt;br /&gt;तुम ने बाहों में गूँथा&lt;br /&gt;पर उसे इतिहास में गूँथने से हिचक क्यों गये प्रभू?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          बिना मेरे कोई भी अर्थ कैसे निकल पाता&lt;br /&gt;          तुम्हारे इतिहास का&lt;br /&gt;          शब्द, शब्द, शब्द ....&lt;br /&gt;          राधा के बिना&lt;br /&gt;          सब&lt;br /&gt;          रक्त के प्यासे&lt;br /&gt;          अर्थहीन शब्द!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुनो मेरे प्यार!&lt;br /&gt;तुम्हें मेरी जरूरत थी न, लो मैं सब छोड़ कर आ गयी हूँ&lt;br /&gt;ताकि कोई यह न कहे&lt;br /&gt;कि तुम्हारी अन्तरंग केलिसखी&lt;br /&gt;केवल तुम्हारे साँवरे तन के नशीले संगीत की&lt;br /&gt;लय बन कर रह गयी .........&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          मैं आ गयी हूँ प्रिय!&lt;br /&gt;          मेरी वेणी में अग्निपुष्प गुँथने वाली&lt;br /&gt;          तुम्हारी उँगलियाँ&lt;br /&gt;          अब इतिहास में अर्थ क्यों नहीं गूँथतीं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                तुम ने मुझे पुकारा था न!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                मैं पगडण्डी के कठिनतम मोड़ पर&lt;br /&gt;                तुम्हारी प्रतीक्षा में&lt;br /&gt;                अडिग खड़ी हूँ, कनु मेरे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                         - धर्मवीर भारती&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3467787994669961572-5056233463830949166?l=baatbolegi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baatbolegi.blogspot.com/feeds/5056233463830949166/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' 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